प्रेम-प्रश्न – अभ्युदय श्रीवास्तव

 
वह माह आषाढ़ जब प्रेम प्रगाढ़,
अवरुद्ध हुआ,जग क्रुद्ध हुआ.
विष-बाणों का अक्षय तुणीर,
गर्जन करता अभेद्य क्षीर,
सागर में लपटें लहक-लहक,
तृष्णा विचलित मैं दहक-दहक,
अपनी जिज्ञासा रौंद-रौंद,
एक प्रश्न रहा था कौंध-कौंध,
 
क्या तुम्हे प्रेम यह वांछित है?
या ह्रदय व्यर्थ रोमांचित है?
 
मरू में हो ज्वाला विस्तृत अपार,
कर जाऊं दावानल निशंक पार,
पर बना अप्राप्य और लगा गुहार,
कर नहीं सकूँ प्रेम का तिरस्कार.
 
अविचलित संबल आशा का,
यहाँ नहीं काम पिपासा का,
यह प्रश्न कहे यह नहीं प्रेम,
यह आग्रह-युक्त,अग्राह्य प्रेम.
Advertisements