हिंदी को क्या चाहिए? (What does Hindi literature need?)

हंस एक मासिक पत्रिका है हिंदी की. अगर मैं गलत नहीं हूँ तो पहले प्रेमचंद ने और फिर राजेंद्र यादव जी ने चलाई थी. आप अगर हिंदी साहित्य में रूचि रखते हैं तो इस से परिचित ज़रूर होंगे. कुछ पन्ने पलटिये और आप को समझ आ जाएगा की हिंदी क्यूँ कम पढ़ी जा रही है. लोग या तो गरीबी या फिर सामाजिक अन्याय पे ही लिख रहे हैं. आम ज़िन्दगी, कॉफ़ी हाउस, लाइब्रेरी, कॉलेज, ये सब कोई मुद्दे ही नहीं रहे. वैसे ये भी सच है की ये जगहें भी अब विलुप्तप्राय होती जा रही हैं. पर इनका विकल्प तो है. सोशल मीडिया पे लिखिए, मैक डोनाल्ड के बारे में लिखिए, आज की कहानी भी ज़रा लिखिए.

हमारी भाषा बेड़ियों में है. छुड़ाने वाले भी नहीं हैं. ये रेखता के मेले में नहीं उद्धार होगा इसका और न ही हिंगलिश से इसका पुनरुद्धार होगा. कुछ किताबें आई हैं  बाज़ार में. बनारस टाकिज और मसाला चाय सरीखी. बोलचाल की भाषा में लिखने से एक हद तक आप भाषा को जिंदा रख पाएँगे. पर उसका साहित्यिक सौंदर्य तो तब ही निखरेगा जब बूढ़े लेखक कमान जवानो के हाथ में देंगे. और वो भी ढंग के जवान हों, जिन्होंने फनीश्वरनाथ को पढ़ा हो, मंटो को समझा हो, प्रेमचंद को निगला हो. ऐसे लोगों को हिंदी में लिखना शुरू करना होगा. और प्रकाशकों को ऐसे लोगों को तवज्जो देना शुरू करना होगा.

ये बात नहीं है की सुरेन्द्र मोहन पाठक जिस मोर्चे को संभाले हैं वो मायने नहीं रखता. क्यों नहीं रखता? पर हमें नए प्रेमचंद भी चाहिए. कब तक एक ही प्रेमचंद से काम चलाएंगे?

हंस में आप देखेंगे की फलां लेखक को फलां सम्मान मिला. एक दूसरे को नारियल और शाल देने से कुछ नहीं होगा. भाषा को फैलाना है तो प्रतियोगिताएं करवाइए. अच्छे लेखकों को निकाल के लाइए. राजकमल प्रकाशन के हाथ में सारे हिंदी साहित्य की बागडोर है. ये किताबघर और वाणी प्रकाशन भी हल्का फुल्का अच्छा काम कर रहे हैं पर वो बात नहीं है.

आज पे लिखिए, और ढंग का लिखिए और उठा के छाप दीजिये. पाठक झक मार के पढ़ेगा. हिंदी झक मार के वापस आएगी और डंके की चोट पे आएगी.

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One comment

  1. हिंदी वैसे तो कभी कहीं गई ही नहीं। हाँ, नया साहित्य ज्यादा अंग्रेजी में ही आ रहा है। अब आता है तो चलता भी है और चलता है तो नया और आता है। हौंसलाअफजाई बाद की चीज़ है, पहले तो हौंसला ही चाहिए। अच्छा लिखा है, साधुवाद।

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