मामुलिया

एक लेखक हुए थे हमारे बुंदेलखंड में. नाम था नर्मदा प्रसाद गुप्त. हिंदी साहित्य में जिन्होंने गहराइयाँ छानी हैं उनको आपका नाम ज़रूर मालूम होगा और काम से भी परिचित होंगे. मैं छतरपुर का हूँ. वो भी छतरपुर के थे. एक पत्रिका निकाला करते थे, नाम था मामुलिया पर मामूली नहीं थी. दूर दूर से हिंदी पढने वाले मामुलिया को चिट्ठी लिखा करते थे. बुंदेलखंड का नाम था, दबदबा था गुप्त जी के बलबूते पे. एक और गुप्त जी भी थे. झाँसी के मैथिलीशरण गुप्त. अब ये नाम तो सुना ही होगा. मतलब झाँसी नहीं, चिरगांव के थे पर आप लोग झाँसी ही समझो.

बात से भटक गया. मैं बता रहा था की मामुलिया फिर आ रही है. उनके पुत्र प्रवीण गुप्त जी प्रयास कर रहे हैं. अब की बार कमान डॉ श्याम सुन्दर दुबे जी के हाथ में है. अपनी रचनाएँ भेज दीजिये उनके नाम, श्रीचंडी जी वार्ड, हटा – ४७०७७५ , दमोह, मध्य प्रदेश के पते पे. पाती पहुँच जाएगी चिंता मत कीजिये. भेज दीजिये. थोडा हिंदी भी पढ़ लिख लीजिये.

संजीदा पत्रिका है और वांछनीय है की आपके लेखन में अंचल की, लोक की ज़रा महक हो. नए अंक का इंतज़ार तो मुझे भी है. अगर मेरे इस ब्लॉग के द्वारा आपको पत्रिका का पता चला है और आपकी रचना स्वीकृत होती है तो मिठाई ज़रूर खिलाइयेगा.

एक फेसबुक पेज भी है. चाहें तो यहाँ भी जुड़ जाएं – मामुलिया

मैं लिखने कुछ और जा रहा था. ये मामुलिया तो बीच में याद आ गया. मैं आपसे कहने जा रहा था राम जी के बारे में. आजकल रामजी का क्या हाल है? मूल्यों का ह्रास तो हो रहा है पर राम अभी भी लोक कथाओं में हैं. नायक ही है अभी भी. तो मतलब कि मूल्य अभी भी हमारे वही हैं. और राम पे सवाल उठाना भी अदिकाल से चला आ रहा है. आप पहले नहीं हैं जिन्होंने उनके रवैये पे सवाल उठाया था. राम ने तब भी प्रश्न पूछने वाले को नहीं ललकारा था. वो राजा थे, चाहते तो इतिहास बदलवा सकते थे पर उन्होंने निंदक को रहने दिया आंगन में. अपने राज्य में हर किसी को जगह दी. (अब हमें आपको पता क्या कथा क्या तथ्य हैं. तथ्य न भी हो तो बात का मूल समझिये)

तो राम की बुराई में भी राम की जीत है. आप रावण को शिवभक्त कह लीजिये, ज्ञानी कह लीजिये पर वो जलता रहेगा हर साल मेले में. धीरे धीरे लोग रावण का दृष्टिकोण समझने की कोशिश करने लगे हैं. उसको भी मानने लगे हैं. कोई कंस का दृष्टिकोण क्यूँ नहीं सोचता? इसलिए क्यूंकि राम ने अपने शत्रु को भी स्वयं चुना. खलनायक बहुत थे, किसी को भी उपाधि मिल सकती थी राम जी के प्रमुख विरोधी की. पहले रावण को मार के हटा साइड करते और फिर मेघनाद या अहिरावण सरीखे किसी को प्रमुख खलनायक बनवा देते. आप किसे महत्त्व देते हैं ये भी आपका चरित्र दर्शाता है. रावण इस सब से नायक नहीं बन गया पर हम उसको समझ सकते हैं, उसको इज्ज़त दे सकते हैं. बस यही राम हैं. राम यही हैं.

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