जा जा कैलाश, जा कर विनाश

दिन भर के सन्नाटे से परेशान हो कर मैंने सोचा कि आओ एक चक्कर लगा लेते हैं. उठ के निकला और चल दिया. तो दाएँ तरफ मेट्रो स्टेशन था और बाएँ तरफ मोहल्ला. हमने कैलाश कॉलोनी मेन मार्किट जाने वाली गली पकड़ी और मुड़ गए बाज़ार की ओर. बाज़ार से निकलते हुई एक तेज़ बी एम डब्ल्यू हमारे सर के बाल उड़ा गयी और आँख में हल्की धूल झोंक गयी. बगल से निकलता हुआ एक आदमी बोला, “हवाई जहाज बना रखा है बेंचो.” सुनके हम मुस्कुरा दिए. दिल्ली में रहने का ये मज़ा तो है. रंगीन भाषा है और हास्यबोध हर किसी का गज़ब का है.

आगे चले तो एक आंटी ने बीच रस्ते में गाडी रोक रखी थी और एक तरफ से निकल कर दूसरी तरफ से कुछ उठा पटक कर रही थीं. पीछे से आने वाले खड़े रहे सांस रोक के. हम उछल के एक दीवार से सट के निकल गए. अब इस मार्किट के बारे में आपको ज़रा बता दें. ये गोलाकार मार्किट है छोटा सा. कुछ बीसेक दुकानें होंगी इसमें या शायद ज्यादा. बीचों बीच एक पार्क है जिसमे अभी अभी कसरत करने के लिए मशीनें लगवाई गयी हैं आम आदमी पार्टी के विधायक द्वारा. विधायक जी ने बैनर पे लिखा है की पिछले विधायक ने फण्ड रोक रखा था और ये उनकी ईमानदारी है कि जिम शुरू हो पाया.

पार्क में इस तरह के और भी हल्के फुल्के राजनीतिक पोस्टर बैनर लगे हैं. मार्किट में गाड़ी ले के जाइये तो पार्किंग वाले पहले छेंक लेंगे. यहाँ लगा लो, यहाँ जगह है. बीस रूपए दो. एक पुराना रेस्तरां है नाम है अनुपम स्वीट्स. महंगा और साधारण खाना. यही मिलेगा. सत्तर रूपए में दो भठूरे तेल भर के. खाना है तो खाओ. आजकल इसको ही सस्ता कहते हैं. बाकी रेस्तरां और भी गए गुज़रे हैं. मुझे बिग चिल का हिसाब किताब समझ नहीं आता. चार सौ रूपए में सलाद और ब्रेड कौन खिलाता है? पर ठीक है, लेबनीज़ बोल के खिलाओ तो सब खा भी लेते हैं.

दो बेकरी हैं यहाँ. एक वेज एक नॉन वेज. यानि एक असली और एक एंवई (ज़ाहिर है नॉन वेज ही असल है). असली वाली का नाम है मैक्सिम. यहाँ आप शाम को जा कर पफ या पेस्ट्री चटका सकते हैं. स्टाफ भी शालीन है. मैक्सिम के मालिक साहब अन्दर बैठ के व्हाट्सएप्प पर विडियो देखते रहते हैं और मन ही मन हँसते रहते हैं. पढने लिखने का खास शौक नहीं है इस मोहल्ले को. एक दो मैगज़ीन, किताबों की दुकानें हैं पर वहां कॉपी पेन ज्यादा बिकते हैं.

थोडा कॉलोनी में घूमेंगे तो आलीशान मकान दिखेंगे. सुन्दर सुन्दर लोग चलते फिरते दिख जाएँगे. शामें पार्क में बड़ी खूबसूरत होती हैं पर घास पे बैठने वाले अक्सर निचले तबके के ही लोग होते हैं. अमीरों के घर में ही घास बिछी होती होगी. या फिर घूमने का शौक नहीं होगा. क्या पता.

रोज़ मैं जब निकलता हूँ तो एक न एक नौकर कुत्तों को घुमाता दिख ही जाता है. और रौबीले कुत्तों का मोहल्ला नहीं है ये. सब फिसड्डी लैप डॉग, टिडीफुक्क टाइप. बालों से आँखें छुपाए हुए, लुकुर लुकुर चलते हुए, अब मरे तब मरे. मुझे तो ये नस्लें कभी अच्छी नहीं लगतीं.

लोग यहाँ मिलनसार हैं. हँस के जवाब देते हैं. आटे की चक्की वाले भैया अपना संघर्ष बता रहे थे की जब उन्होंने दुकान खोली थी तो अकेले ही सब काम संभालते थे. तीस साल तक खुद झाड़ू लगाई अपनी दूकान में तो अब जा के नौकर रखने की हालत में आए हैं.

मैंने पूछा की आपकी दुकान का किराया कितना है तो हँस पड़े. बता रहे थे की अगर किराया देते होते तो अब तक उठ जाते. मार्किट में नित नयी दूकान का बोरिया बिस्तरा उठता रहता है. अभी कुछ दिन पहले यहाँ एक तबास्को नाम का रेस्तरां होता था. अब नहीं है. एक चौबीस घंटे खुला रहने वाला किराने वाला था. वो भी नुक्सान उठा के चलता बना. अभी एक नया पब खुला है अनकल्चर्ड नाम का. रात में वहां से लाइव सिंगर की मधुर स्वर लहरी गूंजती है. उसकी स्वर लहरी बगल वाले दुसरे पब के सिंगर की आवाज़ से टकराती है. कैफ़े ट्वेंटी सेवेन नाम का पब पहले एकमात्र लाइव संगीत का स्त्रोत होता था. अब ये दो हैं.

और एक बिस्त्रो भी है जो बिस्त्रो न हो कर रेस्तरां है. या तो इन्हें बिस्त्रो का मतलब नहीं पता था या इन्होने सोचा नाम बिस्त्रो रख देते हैं, किसको पता बिस्त्रो क्या होता है रेस्तरां क्या होता है, कैफ़े क्या होता है. जटिल है मुद्दा. कभी और मिलिए, समझाऊंगा.

यहाँ डोमिनोज पिज़्ज़ा वाला भी है. उसके बाहर बच्चे खड़े रहते हैं. एक कागज़ पेन ले के, स्कूल की पोशाक में. “भैया एक्स्कूज मी. डोनेशन प्लीज.” बोलते हुए. मंगवाने वाले भी स्मार्ट हो गए हैं. बच्चों को अंग्रेजी सिखा दी है. आप चलेंगे तो बच्चे आपके पीछे पीछे भागेंगे, शर्ट खींचेंगे, और आप थक हार कर दस रुपया दे ही देंगे. पता नहीं इन रुपयों का होता क्या है. कुछ लोग बड़े प्यारे होते हैं, बच्चों को खाने की चीज़ें ले देते हैं. पर गड़बड़ ये है की एक को देंगे तो दस दौड़े आएँगे. देखते हैं आप कब तक दिलदार बने रहते हैं. और ज्यों आप भागे तो लीजिये गाली. एक अदद स्कूल की ज़रूरत है इस इलाके में. ऊंची दुकानें तो बहुत हैं पर असली सुविधाओं की अभी भी गुंजाईश रहती है.

फ़रवरी महीने में पार्क खिल उठता है. अगर मेरे फ़ोन का कैमरा सही होता तो आपको दिखाता की क्या खूबसूरत फूल खिलते हैं यहाँ. रंग बिरंगे. बीचों बीच में पार्क के एक बड़ा सा पीपल का पेड़ है जिसके चारों तरफ ज़मीन पोली है. चूहें हैं भाईसाहब. चूहो ने पूरा पार्क खोद रखा है. गिलहरियाँ पेड़ों पर और चूहे ज़मीन में. रोडेंट फॅमिली जिंदाबाद.

Advertisements

4 comments

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s