कनॉट प्लेस पे बकवास

सबने कहा कि हिंदी में ज्यादा लिखा करो. इतना साधुवाद मिला कि मन को अपार प्रसन्नता टाइप हो गयी. इसलिए जब तक विचार आते जा रहे हैं, हम सोच रहे हैं की ज्यादा से ज्यादा अपने चिट्ठे में उड़ेल लें.

एक जगह है दिल्ली में कनॉट प्लेस, नाम तो सुना होगा. यहाँ पर बीचों बीच एक पार्क है जिसको कहते हैं सेंट्रल पार्क और वहां जिस दिन आपको मन होता है अन्दर जाने का, ये उसी दिन देख रेख के लिए बंद होता है. बाहर से घुमते हुए आप प्रेमी युगलों को भांति भांति की मुद्राओं में देख के शर्मसार हो सकते हैं. अधिकतर जोड़ों में मादा रूठी बैठी होती है और नर उसको मना रहा होता है. हर जोड़े में नर का चेहरा देख लीजिये वही कातर निगाहें, वही दयनीय मुस्कान. ये प्रेमी युवक भी एक अलग ही प्रजाति होती है.

सेंट्रल पार्क के चारों तरफ बाज़ार है. गोलाकार नक्शा है इसलिए आप खो नहीं सकते अगर आप अंग्रेज़ नहीं हैं तो. हर बार जब मैं जाता हूँ, एक न एक विदेशी नक्शा ले के रास्ता पूछता मिल जाता है. पक्का चबूतरा बना है पूरे बाज़ार में, और चिकने चबूतरे के फर्श पे बैठे हैं लोग मोबाइल कवर, बैग, चूड़ियाँ, शू पोलिश ले के. अंग्रेजों को देखते ही हर माल की कीमत तिगुनी हो जाती है. डॉलर की शक्ति की महिमा है भैया. फिर चाहे गोरा किसी गरीब यूनान सरीखे मुल्क का ही क्यूँ न हो. हम तो महंगा ही बेचेंगे. आपकी चमड़ी गोरी है तो आपकी झंझट है.

गोरों को देख के मेरा मन बहुत करता है मदद करने का, भारतीय स्वागत संस्कृति दिखाने का. पता नहीं अफ्रीकन लोगों को देख के ये संस्कृति कहाँ चली जाती है. नस्लवाद हमारे देश के खून में दौड़ता है.

इस बाज़ार में बहुत सारी दुकानें हैं और सब मशहूर एक से बढ़कर एक. एक बेकरी है वेन्गर्स. यहाँ पे पता नहीं चलता पर्ची कहाँ कटानी है, पेस्ट्री कहाँ से लेना है, पैसे कहाँ देने हैं. अन्दर जा के एक काउंटर से दुसरे काउंटर का रास्ता पूछना पड़ता है. पर अगर आपने किसी तरफ मोटे अंकल को धकेल के, छोटे बच्चे को अलग कर के, भीड़ को गच्चा दे के, किसी तरह पेस्ट्री या पैटी या कुछ भी हासिल कर लिया तो समझ लीजिये की आपकी ज़िन्दगी मुकम्मल है. माल साधारण भी हो तो भी वेंगर्स का है इसलिए अच्छा है.

आगे चल के एक मिल्कशेक की दुकान है. अब दूध तो दूध है भाई, इसमें क्या ख़ास होगा पर नहीं, दिल्लीवालों से मत कह दीजियेगा. यहाँ पे लाइन लगा के पचास रूपए का दूध पीते हैं एक गिलास बिना मलाई मार के. फ्लेवर की बात है तुम क्या समझोगे गाँव का ताज़ा दूध पीने वाले.

और आगे चलेंगे तो पान वाला है एक ओडियन के सामने. ओडियन क्या है ये मैं क्यूँ बताऊँ. तो इस पानवाले ने मुझे पहली बार चुस्की पान खिलाया था. मुझे लगा शरीफों का शहर है, शराफत से खिला देगा पर यहीं तो हम मात खा गए. चुस्की पान शराफत से खाया जाता है और न खिलाया जाता है. पान की पुंगी बना के उसमे बरफ भर के पानवाला आपसे आ करने को कहता है. आप आ करते हैं और ये नुकीला बर्फयुक्त पदार्थ वो आपके मुंह में ठूंस देता है. और ठूंसा तो ठीक पर साथ में वो आपको मुंह बंद रखने बोलता है ठुड्डी पे थपकी मार के. मतलब ऐसे कौन खिलाता है भाई?

अगर बरफ से मुंह जम न गया हो तो आगे बढिए, और भी बहुत दुकानें हैं. सबके बारे में तो आज कहना मुश्किल है, इस चिट्ठे को आगे क्रमशः समझिये.

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4 Comments Add yours

  1. Hilarious. I am definitely going to read this letter as it continues.

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  2. rohit says:

    मस्त रे..अच्छे और बड़े लिखाड़ बनने की ओर अग्रसर हो रह हैं…..मीटअप पर अभी मैसेज देखा तो सोचा चलो देख लिया जा…आखिर कनॉट प्लेस तो अपन के सांसों में बसता है ..और भैये शर्मसार होने की क्या जरूरत है…देखिए, मस्त होईए और नजर घूमा लीजिए, अच्छा लगे तो ठीक, वरना पार्क की हरियाली देखिए….रह गया नस्लवाद तो चिंता न करें…..कुछ दिन (साल भी लग सकते हैं) और कनॉट में आते-जाते रहेंगे तो नस्लवाद का तीखापन बहुत कम हो जाएगा…

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    1. Abhyudaya says:

      शुक्रिया. अभी अच्छा लिखाड़ बनने में तो समय है पर हौसला अफजाई की ज़रुरत थी और रहेगी. हां, आते जाते रहेंगे तो हमारी शर्म और चीज़ों का तीखापन कम होता जाएगा. नरम हो जाएँगे तो शायद लेखन कड़क बन पड़ेगा. आपके ब्लॉग पे शिरकत करते हैं अब. 🙂

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