कनॉट प्लेस पे और बकवास

आपके संदेशों का सिलसिला थम नहीं रहा. सब कह रहे हैं कि मज़ा आ रहा है अपनी वाली हिंदी पढ़ के. सच कहूं तो मुझे भी हिंदी में लिख के अच्छा लग रहा है. हिंदी में सचमुच ज्यादा कहने को है और दुर्भाग्यवश अच्छे चिट्ठों के अभाव में कम पढने को है. इस अंतर का फायदा मुझ जैसे औसत दर्जे के चिट्ठा लेखकों को हो रहा है. आइये अपनी कनॉट प्लेस वाली चर्चा को जारी रखें.

यहाँ एक पुराना सिनेमा हाल हुआ करता था – रीगल सिनेमा. अब ये बंद हो रहा है. कभी अन्दर गया नहीं पर दुःख है मुझे भी. पुराना सिनेमा हॉल देख के लगता है की अगर कभी इंसानियत वाली कीमतों पे फिल्म देखने का मन हुआ तो कम से कम दिलासा तो है की यहाँ जा के देख सकते हैं. सारे पुराने टाकीज़ वाले भाई भाई लगते है. फिर चाहे वो जयपुर का राजमंदिर हो, ग्वालियर का हरिनिर्मल हो या फिर चंडीगढ़ का नीलम टाकीज़ हो. चलो कोई बात नहीं.

अगर आप कनॉट प्लेस से जनपथ रोड पकड़ लेंगे तो रास्ते में एक दक्षिण भारतीय रेस्तरां आएगा जिसका नाम है सरवणा भवन. यहाँ पर लोग कतार में लगे होंगे आतुर निगाहों से अन्दर झांकते. एक महिला जो मुस्कुरा नहीं रहीं होंगी, वो इनके सबके नाम पर्ची पे लिख के एक एक कर के इन्हें अन्दर भेज रही होंगी. जैसे जैसे मेज खाली होती जाएंगी, ये लोगों को अन्दर भेजती जाएंगी. लोग खड़े रहेंगे तमीज से, अपनी बारी का इंतज़ार करते. आप सोचेंगे के दस ठो दक्षिण भारतीय भोजनालय होंगे आस पास, फिर इतनी भीड़ और मारामारी क्यूँ? तो जवाब ये है कि यहाँ की गुणवत्ता अच्छी है. स्पष्ट रूप से यही कारण हो सकता था. और ये भी है की अन्य दक्षिण भारतीय भोजनालय थोड़े राम भरोसे किस्म के भी हैं. बाबा खड़क सिंह मार्ग पे जो अपना इंडियन कॉफ़ी हॉउस है उसमे बैठने को जगह नहीं मिलती और अगर मिल भी जाये तो वेटर नहीं आता. और अगर आपकी मेज खुले में है तो ऐसा भी हो सकता है की बन्दर आ के आप पे आक्रमण कर दे. मजाक नहीं कर रहा हूँ, भोजनालय में बन्दर हैं. अरे, आपको मजाक लग रहा है.

और एक और भोजनालय है जिसका नाम है मद्रास कैफ़े. जितना खूबसूरत नाम है, खाना उतना ही वाहियात. ये काफी पुराना रेस्तरां है तो अब शायद इन्हें गुरूर हो गया है. घोल को तवे पे डाल के, छिस्स्स की आवाज़ होते ही शायद ये शायद समझ लेते हैं कि डोसा बन गया. आप शिकायत करेंगे तो आपको ही समझा देंगे कि ऑथेंटिक डोसा ऐसा ही होता है और आपको ही शायद स्वाद का ज्ञान नहीं है. पहले अपना मुंह हमारे डोसे के लायक करिए, फिर आइयेगा.

तो इसलिए शायद हर व्यक्ति जिसका मुंह मद्रास कैफ़े के डोसे के लायक नहीं है या जिसे अपना मुंह बन्दर से नहीं कटवाना, वो सरवणा भवन आ जाता है. अरे हां, ये शाकाहारी जगह है. अगर दंद-फंद खाना है तो आन्ध्रा भवन की बिरयानी और केरल भवन की मछली का भी कोई जोड़ नहीं है.

जनपथ पे और थोडा आगे चलेंगे तो खूबसूरत कारीगरी के काम देखने मिलेंगे. आपके लिए नहीं हैं, ये विदेशी पर्यटकों को थोड़ा लपेटे में लेने वाली चीज़ें हैं. आप आगे बढ़ते रहिये. हाँ, यहाँ हथकरघा उद्योगों और अन्य कलाओं की प्रदर्शनी लगती है, साड़ियाँ, शाल वाले आते हैं. वहां एक चक्कर मार सकते हैं अगर कुछ अच्छा लग जाये तो ले भी सकते हैं. पर एक विशेष चेतावनी, अगर आपके पास समय कम है, और मम्मी को ले के आये हैं तो चुपचाप चलते रहिये. अगर मम्मी ने ये दुकानें देख लीं तो हर दुकान पे चार चार घंटा लगेगा, हर साड़ी खुलेगी- और ये सब कहा जाएगा कि इसमें दूसरा रंग दिखाना, इसमें पैटर्न दूसरा नहीं है? और दूसरी कोई दिखाओ जिसमे ये मोर बने हों… फलाना ढिकाना. लेना देना चाहे धेला न हो.

जनपथ मार्किट में घुस जाएँगे तो नज़ारा बदल जाएगा. क्राफ्ट मार्किट में जहाँ बारीकी से नक्काशे हुए नमूने थे, यहाँ पे लोग नमूने हैं. कपड़ो की ढेरी लगी है, हर माल दो सौ रुपया. लोग अपनी पसंद के कपडे छांट रहे हैं और थोक में ले रहे हैं. बीच सड़क पे लड़कियां मुंह से चोंच बना के सेल्फी ले रही हैं. और कोई संदिग्ध सा आदमी थोड़ी आनाकानी के बाद चार हज़ार के रे बेन के चश्में चार सौ में दे रहा है. यहाँ के कपडे सस्ते इसलिए हैं कि फैशन के इस दौर में गारंटी कैसी? बस एकाध महीना पहन के फेंको फांको. है कि नहीं? दिल्ली जवांदिल लोगों का शहर है और जवां दिल किसी एक पे नहीं टिकता. इस लिए इस मार्किट में सबसे ज्यादा रौनक है.

रौनक तो पालिका बाज़ार में भी है जिसे अपन पीछे छोड़ आए थे. कनॉट प्लेस के तलघर में एक अंडरग्राउंड टाइप मार्किट है. इसमें हर चीज़ की बोली लगती है. उल्टी बोली. वो बोलेगा दस हज़ार, आप बोलोगे दस रुपया. वो बोलेगा मजाक कर रहे हो बेंचो, आप बोलोगे शुरू किसने किया बेंचो. फिर आप बोलोगे की चू समझा है क्या, मैं भी लोकल ही हूँ. फिर वो बोलेगा अच्छा पांच हज़ार लाओ. फिर आप बोलोगे रैन दो. फिर आप जाने लगोगे तो वो हाथ पकड़ लेगा. ना जाओ सैंया. फिर आप बोलोगे ठीक ठीक लगाओ तो वो बोलेगा लाओ चार सौ दे दो. आप ले तो लोगे पर मन में यही रहेगा कि स्साला ठग तो नहीं गए?

कनॉट प्लेस पे चर्चा ख़त्म ही नहीं हो रही. अगले चिट्ठे में और बात करते हैं. अपने सन्देश और गालियाँ भेजते रहिये.

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