कनॉट प्लेस पे बकवास का तृतीय खंड

कनॉट प्लेस पे आप किताबें खरीदने भी आ सकते हैं. चबूतरे पे लोग मलाला युसुफजई की आत्मकथा से ले कर टॉलस्टॉय के उपन्यास तक ले कर बैठे रहते हैं. कीमतों में छूट नहीं है पर किताबें आपके एक बार के मैकडोनाल्ड मील से तो सस्ती ही हैं. मन लुभाए तो ले डालिए. एन ब्लाक में ऑक्सफोर्ड बुकस्टोर है. यहाँ घुसने से पहले अपना झोला वगैरह जांच करवाना होता है की कहीं किताबों की तस्करी तो नहीं कर रहे. अन्दर काफी खुशनुमा माहौल है. एक तरफ कैफ़े है चा-बार नाम का और दूसरी तरफ पुस्तकालय. पहले ये काफी खूबसूरती से सजाया हुआ होता था, हर आले में लिखा होता था कि किस शैली की पुस्तकें हैं, और कुछ जगहों पे नयी छपी किताबें सजी होती थीं. पर लगता है धंधा चला नहीं. अब एक कोने में टैरो कार्ड ले के एक महिला बैठी होती हैं. और क्यूंकि टैरो में तवे के आकार की बिंदी लगा के और भूतिया मेकअप करके बैठना अनिवार्य है इसलिए ये भी ऐसे ही तैयार होती हैं. मेरा मकसद छींटाकशी नहीं है पर टैरो को ले कर कभी श्रध्दा नहीं जाग सकी. अगर बुरा लग रहा हो तो क्षमा करें. और न कर पाएं तो कोई बात नहीं. ऑक्सफ़ोर्ड में अब अन्दर ठेले लगे हुए हैं. शायद मालिक को मालूम हुआ है कि किताबों से ज्यादा यहाँ स्टीकर, पोस्टर, ताबीज़, ब्रेसलेट, कड़े, कंगन और आलतू फालतू आइटम बिकते हैं इसलिए यही सब रखने लगे हैं. किताबें अब पहले जैसे करीने से नहीं सजी हैं. इधर की उधर पड़ी हैं. दुःख होता है देखकर.

एक जैन बुकस्टोर भी है. यहाँ बाहर से कांच की खिड़की से अन्दर की किताबें दिखती हैं. मन काफी ललचाता है पर कोई छूट, ऑफर वगैरह नहीं है तो मन मसोस के अमेज़न से ही मंगवा लेते हैं. ऑनलाइन शौपिंग के चलन ने किताब की दुकानों की कमर तोड़ दी है. कनॉट प्लेस का सबसे अच्छा बुकस्टोर अमृत बुक शॉप ही है. यहाँ के मालिक किताबों के जानकार हैं और संग्रह भी बहुतई अच्छा है. अन्दर जा के मैं हर बार खो जाता हूँ. सेकंड हैण्ड किताबें भी यहाँ कौड़ियों के दाम मिल जाएंगी. अगर दरियागंज जा के धक्के खा के बेहतरीन किताबें किस्मत के हाथ से छीनने का माद्दा नहीं रखते हैं तो यहाँ से खरीदना ही उचित रहेगा. बाकी वैसे तो दरियागंज मार्किट का कोई जोड़ नहीं है.

अरे हां एक और दुकान भी है. रीगल सिनेमा के पास ही है, बरिस्ता से लगी हुई. नाम है पीपल ट्री. बाहर से लगेगा कि कपड़ो की दुकान है. पर अन्दर चले आइये. अन्दर बुकस्टोर है. और यहाँ दुर्लभ किताबें उपलब्ध हैं. नसैनी से ऊपर चढ़ के जाएँगे तो और भी किताबें हैं. यहाँ आपको लगेगा कि आप सिंदबाद हैं और ये सारा खजाना है जो आपको लूटना है. पैसे हों तो ये है जन्नत. पैसे न हों तो मांगते रहिये मन्नत.

कनॉट प्लेस पे और भी कई चीज़ें हैं. कुछ बातों का ख्याल आपको दिल्ली में कहीं भी घुमते वक़्त रखना होगा. एक प्रजाति पाई जाती है यहाँ पे जो कनॉट प्लेस, नेहरु प्लेस, खान मार्किट कहीं भी मिल सकती है. ये हैं झंडे वाली आंटी. ये एक कागज़ का छोटा सा तिरंगा ले के खड़ी होती हैं मेट्रो गेट के बाहर. आप निकलिए तो, बोलेंगी, एक्सक्यूज़ मी और लपक के आलपिन से आपकी शर्ट पे तिरंगा टांक देंगी. आप सोचेंगे कि चलो कोई बात नहीं, देशभक्ति हो गयी. पर बात ये नहीं है. इन्हें चाहिए सुबूत आपके देशभक्त होने का. बोलेंगी अब लाओ पैसे. आप बोलेंगे काहे के पैसे भाई. तो बोलेंगी कि अरे वाह, तिरंगा तो लगवा लिया अब पैसे देने में जान सूख रही है. आप डर के पैसे दे देंगे. पर मैं बता रहा हूँ, डरना मत. ये कोई गैंग टाइप है. इनसे बचने का नुस्खा ये है की आप आगे बढ़ते जाइये. झंडा वंडा कुछ नहीं. देशभक्त आप हैं, आपको पता है, काफी है.

अगर आपको हिन्दी में लेख अच्छे लग रहे हैं तो बताते रहिये. मैं कोशिश करूँगा कि और लिखूं.

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