ग्वालियर में विक्रम की सवारी

सिंधिया राजघराने के लिए जाना जाता है ये शहर. ग्वालियर के रेलवे स्टेशन से उतरते वक़्त आप महसूस करेंगे कि किसी राजसी आन बान शान वाली जगह आ पहुंचे हैं. तभी अचानक कोई आपके पैर के पास पान थूक देगा और आपको आईडिया लग जाएगा कि मतलब नहीं, इतना भी नहीं. यहाँ पे ऑटो वाले आपसे मनुहार करेंगे कि हमारे साथ चल लो, हमारे साथ चल लो और जब आप मान जाएँगे और इनके पीछे चल पड़ेंगे तो ये भीड़ में पहले तो ओझल हो जाएँगे. फिर थोड़ी देर में प्रकट होंगे आगे दूर कहीं. आप अपना सामान घसीटते इनके पास पहुंचेंगे पर मालूम पड़ेगा कि इन्होने आपके हां की व्यवस्था नहीं की थी. इन्हें लगा था आप मानेंगे ही नहीं और इनका ऑटो तो चारों तरफ से घिरा हुआ है. कुछ गाली गलौज और मान मनुहार के बाद इनका ऑटो स्टैंड से निकल के आपके सामने होगा. अगर आप गर्मी में गए हैं तो आपको अंदाज़ होगा कि ये जो वक़्त आपने ऑटो के इंतज़ार में निकाला है इसमें आपकी त्वचा में आग लग चुकी है.

अगर आप उनमें से हैं जो ऑटो नाम की चीज़ में विश्वास नहीं रखते तो आप विक्रम ले सकते हैं. विक्रम एक प्रकार का वाहन होता है जो फटफटफटफट करते हुए चलता है. इसमें आप पांच दस रूपए में पूरा ग्वालियर घूम सकते हैं. सामने की ओर ड्राईवर के बगल में दो लोग बैठ सकते हैं पर बैठते तीन हैं. तीसरा जो ड्राईवर के बगल में बैठता है, उसके घुटनों में ड्राईवर गियर की डंडी मारता रहता है और बोलता रहता है की ढंग से बैठो. ये विक्रम आपको गाज़ियाबाद, झाँसी और अन्य शहरों में भी मिल जाएँगे. हर शहर में विक्रम के नियम एक ही हैं. मान लो आपको मुरार उतरना है और मुरार आने वाला है तो आप विक्रम की छत पे मुक्का मार के चिल्लाइए “रोक के चलना भाई!” और विक्रम रुक जाएगा. फिर आप ड्राईवर के बगल में बैठी सवारी को दस का नोट दीजिये जो की हाथोंहाथ ड्राईवर तक पहुँचाया जाएगा. ड्राईवर के बगल में बैठी सवारी को कंडक्टर का काम मुफ्त में करने की ज़िम्मेदारी दी जाती है. ड्राईवर दस रूपए देख के पूछेगा की छुट्टा नहीं है? आप बोलेंगे कि नहीं और मन ही मन सोचेंगे की दस रूपए छुट्टे ही तो होते हैं. ड्राईवर फिर आपको अपने डैशबोर्ड के बगल में बने गढ्ढे में से रेजगारी निकाल के देगा. आप बिना गिने अपनी जेब में रख लेंगे. कुछ कुछ लोग दो दो रूपए के सिक्के भी गिनते हैं और पूछते हैं की भिया छे रूपए होते थे, आपने सात कैसे ले लिए.

विक्रम के नियम अलग हैं. अगर गर्मी का मौसम है और आप पान की टिपरी से पानी के पाउच के के चढ़े हैं तो आपको अपने बगल में बैठे वालों को भी पूछना चाहिए. अधिकांश लोग दो तीन पाउच ले के चढ़ते हैं जिससे अगल बगल वालों को पानी पूछ सकें. विक्रम में महिलाओं के साथ छेड़छाड़ वाला हिसाब नहीं है. सब सट के बैठते हैं पर मजाल है कोई उलटी सीधी हरकत हो जाये. ऐसा पटक पटक के मारेंगे के आपका चेहरा नाकाबिल-ए-पहचान हो जाएगा. ग्वालियर है ये भाईसाब.

विक्रम में लड़कियां पहले बेधड़क बैठती थीं पर आजकल सब बदल रहा है. अब सब फूलन देवी जैसे मुंह पे गमछा बाँध के बैठती हैं. ये आजकल हर छोटे शहर का हाल है. सब लड़कियों का मुंह पे कपड़ा बांधना अनिवार्य हो गया है. पता नहीं ग्लोबल वार्मिंग की वजह से या फिर कोई सामाजिक बदलाव है.

हर विक्रम में एक दिन ऐसा आता है जब उसमें कोई मोटे अंकल या आंटी धंस जाते हैं. अगर आपकी सीट खिड़की के पास वाली नहीं है तो सांस लेना दूभर हो जाता है. शास्त्रों में विक्रम की बाहर वाली खिड़की सीट का विशेष महत्व वर्णित है. ये उतरने में आसान और हवादार होती है. इसके इसी फायदों की वजह से यह अत्यधिक झगड़ों का कारण बनती है. झगड़े भी हाथापाई वाले नहीं. मानसिक आक्षेप ही बस. आप टिड़ी-फुक्क टाइप के हैं और खिड़की पकड़ के बैठे हैं तो कोई भी चढ़ने वाला आएगा और बोलेगा की खसको म्हइं को. आप बोलेंगे की नहीं खसकना तो वो आपको घूरता हुआ बैठ जाएगा अन्दर आ के. फिर आपके और उसके बीच शीत युद्ध प्रारम्भ हो जाएगा. विक्रम से जब तक उतर न जाएं तब तक आप दोनों दुश्मन हैं.

पर ऐसे मौके कम ही आते हैं क्यूंकि विक्रम में चढ़ने वाले ज़्यादातर सीधे सादे, धीर गंभीर, कामकाजी लोग होते हैं जिन्हें पंगे नहीं लेने होते. विक्रम से पहले टेम्पो चला करते थे जो काला धुआं छोड़ते थे. उनकी नाक लम्बी होती थी और सड़क पे ऐसे दौड़ते थे जैसे पागल भैंसा. जब भी कोई टेम्पो बीच रस्ते ख़राब होता था तो रास्ता जाम हो जाता था. उसकी नाक सड़क पे रखी होती थी और आस पास का माहौल ग़मगीन हो जाता था. विक्रम ख़राब होता है तो इतना रास्ता नहीं रुकता. धुआं छोड़ने की आदत इसने अपने टेम्पो पापा से ही सीखी है. लगता है समय के साथ विक्रम भी अतीत का हिस्सा बन जाएगा पर छत पे ठकठका कर रोकने की परंपरा नए इको-फ्रेंडली टेम्पो में भी बरकरार है.

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