जब कमरे में कबूतर आ जाता है

कबूतर से ज्यादा ज़लील चिड़िया नहीं होती. घोंसला इनका दो कौड़ी का होता है. दिनभर गुटरगूं करते रहते हैं और हर चीज़ पे अपना सफ़ेद सफ़ेद गिराते रहते हैं. जब मैं छोटा था तो छोटे शहर में रहता था जहाँ कबूतर नहीं होते थे. कबूतर सिर्फ मैंने टीवी पे मुंबई के गेटवे ऑफ़ इंडिया के सामने और दिल्ली कनॉट प्लेस पे सवेरे सवेरे देखे थे. मुझे लगता था कि यार छतरपुर में कबूतर क्यूँ नहीं हैं. पर अब जा के समझ में आया कि ये पक्षी छोटे शहरों में क्यूँ नहीं रहता. बात ये है कि छोटे शहर हैं शरीफों के लिए और ये होते हैं हरामी, चालू टाइप. इनका कोई ईमान धरम नहीं होता. कहीं भी बीट कर देते हैं फिर चाहे वो किसी गरीब का कन्धा क्यूँ न हो. किवदंती है कि अगर आप पे कबूतर गन्दा काम कर दे तो मतलब आपका अच्छा समय आने वाला है. लगता है ये किवदंती भी कबूतरों ने मिल के किसी तरह प्रोपेगंडा बना के प्रचारित की है. कबूतर वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष कबूतर लाल ने सदस्यों से पूछा होगा कि है कोई ऐसा तरीका जिससे हम इंसानों पे हगते भी रहें और इंसान ये सोचें की वाह भई धन्य भाग हमारे. और सदस्य कबूतर बोला होगा कि ऐसा करते हैं की अपनी टट्टी को लकी घोषित कर देते हैं. मतलब कुछ भी यार.

अब मैं बड़े शहर में रहता हूँ और दिनभर मेरे खिड़की पे कबूतर पंख फडफडाते रहते हैं. कसम से मन करता है के खेंच के तमाचा जड़ दूं सालों में. रोशनदान से कबूतर झांकता है. आप बाथरूम में नित्यकर्म से निवृत हो रहे हैं और अचानक कबूतर मुंह निकाल के कहता है. क्या कर रहे हो मियाँ? आप चिल्लाते हैं हुश, हट, भाग! और कबूतर गुटरगूं करके बोलता है अच्छा ठीक है थोड़ी देर में आ के तुम्हारी ऐसी तैसी करता हूँ. फिर आप अपने काम में तल्लीन. अचानक पंखों की फड़फड़. आप देखते हैं की अपनी मनहूस शकल ले के एक कबूतर आपके कमरे में दाखिल हो चुका है. इसको देख के उन रिश्तेदारों की याद आएगी जो बिना बुलाये आ जाते हैं और फिर आपका वाईफाई पासवर्ड ले के दस दस एम बी के विडियो डाउनलोड करते हैं.

अब पठ्ठा आ तो जाएगा पर वापस जाने का नाम नहीं. भड़भडा के पूरे कमरे में उड़ेगा पर जिस रोशनदान से आया था उस तक पहुँचने का नाम नहीं. मतलब सुना था कि कबूतर को रस्ते इतने याद होते हैं कि संदेशवाहक का काम कर लेता है. पर ये महामूर्ख एक खिड़की नहीं ढूंढ पाते. तो ये फिर आपके कमरे की हर ज़रूरी चीज़ पे उड़ उड़ के बैठेंगे, दीवार वे टंगी तस्वीर गिराएंगे, किताबों पे बीट करेंगे और फिर अपना निकल लेंगे. मन तो करता है कि पास की बिल्ली को इसके घोंसले का पता दे दूँ पर फिर लगता है कि चलो छोड़ देते हैं.

तो अंततः निष्कर्ष ये है कि कबूतर सिर्फ लप्पड़ के लायक है.

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