विनोदकुमार शुक्ल की किताब

पुस्तक का नाम- दीवार में एक खिड़की रहती थी

लेखक- विनोदकुमार शुक्ल

उपन्यास

हिंदी में लोगों के प्रेमचंद के ऊपर नीचे कुछ समझ नहीं आता. यार और भी लोग अच्छा लिख लेते हैं. हम भी लिखेंगे किसी दिन. पर अभी तो शुक्ल जी की बात करनी है. शुक्ल जी ने जाने क्या ही लिख दिया है पर अच्छा है.

इनका लिखने का तरीका वाकई अजीबोगरीब है. मतलब एक महाविद्यालय में एक व्याख्याता हैं – रघुवर प्रसाद और उनकी पत्नी हैं सोनसी. दोनों बहुत ही ग्रामीण परिवेश में, एक साधारण से घर में रहते हैं. घर में एक खिड़की है जिस से कूद के निकल जाओ तो बाहर नदी बहती है, तालाब है, बन्दर हैं, बुढ़िया है, और जाने क्या क्या है. रघुवर को महाविद्यालय ले जाने के लिए कभी कभी साधू बाबा हाथी पे आते हैं. सबकुछ अमूर्त और भावात्मक सा लगता है. शब्द बहुत ज्यादा जाने पहचाने हैं.

पुस्तक में कोई दुखद घटना नहीं है. कोई कहानी ही नहीं है. बस दो लोग जी रहे हैं और हमें आपको उन्हें देखना है. जीते हुए. और फिर भी ये पढ़ना आपके लिए एक अविस्मरणीय घटना होगी. आप याद रखेंगे हर उस छोटे छोटे मोटिफ को जो लेखक ने इस्तेमाल किया है. अपनी बात कहने के लिए या कभी कभी ना कहने के लिए. गूलर के पेड़ पे बैठा बच्चा बीड़ी पीता हुआ अपने पिता से छुपकर, एक पति जो अपनी पत्नी से प्रेम करता है, ऐसा निष्कपट प्रेम जो आपसे सपने में बातें करवाता है.

एक विभागाध्यक्ष साहब जो जब चाहे तब छुट्टी दे देते हैं. आपको महाविद्यालय से घर छोड़ देते हैं. आपके जीवन में हस्तक्षेप करते हैं उसी तरह जैसे कोई बड़ा भाई करेगा. पड़ोसी जो आपके दरवाज़े का ध्यान रखते हैं. ये छोटे शहरों का, भोले लोगों का उपन्यास है. दुर्गन्ध यहाँ सिर्फ बस स्टैंड पे निवास करती है क्यूंकि बस स्टैंड सूचक है बाहरी दुनिया का. यहाँ की दुनिया में तो फूल है, हवा है, और दूर कहीं होते हवन की महक है.

यदि इस पुस्तक की भाषा में ही कहूँ तो – “जब आप इसे पढ़ेंगे तो आपके सामने इसके शब्द होंगे. शब्द न होने से पहले आपके सामने वह चित्र होगा जिसमे वो शब्द नहीं होंगे. पर उन शब्दों की आहट होगी. फिर थोड़ी समय में आप होंगे और शब्द होंगे. और वह चित्र इंतजार करेगा जब आप पुस्तक बंद करेंगे. पुस्तक अलग रखते ही फिर चित्र होगा. और शब्द फिर भी होंगे पर चित्र भी होगा.”

तो ऐसी कुछ एबस्ट्रेक्ट सी भाषा है जिसका अर्थ है भी और न भी हो तो मज़ा तो है.

पढ़ जाइए १६० पेज ही हैं.

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