नवरात्रा स्पेशल

आपके व्रत और साबूदाने की खिचड़ी के अलावा नवरात्र का एक और महत्त्व भी है. भगवान में आपका विश्वास हो न हो, मातृ शक्ति में तो होगा. आपको पता है न माँ को माँ का दर्ज़ा कैसे मिला है? हम माँ को त्याग से और शक्ति से जोड़ते हैं. व्रत एक तरह का तप है जो आप जगत जननी के लिए श्रद्धा में रखते हैं. व्रत नहीं रख सकते तो कोई बात नहीं, रखने वाले कौनसा बड़ा अच्छे से रखते हैं. आलू उबाल के, साबूदाने की खिचड़ी खा खा के, सिंघाड़े के आटे की पूरियां और फल वल सब चटकार के कहते हैं हमने व्रत रखा है.

हमारे देवी देवताओं का धार्मिक महत्त्व तो है ही, साथ ही ये प्रेरणा के स्रोत भी हैं. आप कृष्ण भगवान् से दुनियादारी सीख सकते हैं, रामजी से आपको आदर्श मिलेंगे, हनुमान आपकी अंदरूनी शक्ति को जगाएँगे और शिवजी से आपको ये सीख मिलेगी कि सांसारिक चीज़ों से परे एक बेहतर दुनिया भी है. दुर्गा माँ का सन्देश मातृत्व के बारे में है. आप माँ को कई नामों से बुला सकते हैं पर जज्बा एक ही है. कोई भी और नहीं है जो आपकी दुनिया को चारों तरफ से घेरता है. 

उदाहरण के तौर पे जब आपके बाल कंघी से उलझ के खिंच जाते हैं तो आप माँ के चेहरे पे दर्द के लकीरें सुस्पष्ट देख सकते हैं. आप जब गिरते हैं या गिरने वाले होते हैं तो माँ को देख लीजिये जो कांप सी जाती है. गिरने पे उठने को दुनिया कहती है. पर आप के गिरने से माँ को फर्क पड़ता है, ये सोच के ज़रा राहत होती है. आपको पता है आप जब किसी से कहते हैं की मैंने खाना नहीं खाया और वो कहता है कि खा लो तो उसकी बात नकली सी क्यूँ लगती है? क्यूंकि कोई और कभी माँ की तरह नहीं कह सकता. अगर आप अपना ख्याल नहीं रख रहे हैं तो आप खुद को नहीं अपनी माँ को दुःख दे रहे हैं. कितना सुन्दर विचार है. आप खुद के लिए नहीं हैं. आप उनके लिए हैं.

माँ को और नारी शक्ति को चित्रित थोड़ा गलत किया जाता है. कहते हैं कि सबकुछ सह कर आपने बच्चों को बड़ा करने वाली ही माँ होती है. त्याग की  मूर्ति और जाने क्या क्या. माँ को ढूंढना इतना कठिन नहीं है. रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में भी आप माँ की शक्ति देख सकते हैं. माँ वो है जो एक तरफ उफनता दूध और दूसरी तरफ रोता बच्चा ऐसे संभाल लेती है जैसे कितना आसान हो. माँ वो है जिसे सब याद रहता है, आपके जन्मदिन से ले कर आपकी हर छोटी बात तक. माँ आपकी आवाज़ से बता देंगी कि आपको फिर जुकाम होने वाला है. और माँ की डांट का बुरा भी नहीं लगता. क्यूंकि माँ अपनी होती है. ये नहीं कि बाकी सब पराये होते हैं. पर बाकी सबको आपको कुछ बताना पड़ता है, माँ बिन बताये सब समझ लेती है. जब हम माँ के सामने सर झुकाते हैं तो न शक्ति मांगते हैं न आशीर्वाद. वो सब अपने आप मिल जाता है. प्रेम और वात्सल्य बहता ही रहता है. हम सर झुकाते हैं क्योंकि सर झुक जाता है खुद-ब-खुद. ऐसी मातृ शक्ति को नमन. ऐसी दुर्गा माँ को नमन.

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