मउरानीपुर की मंगोड़ियाँ

भारत में अभी भी कई स्थान ऐसे हैं जहाँ यातायात व्यवस्था सुचारू रूप से नहीं चल पा रही है. बुंदेलखंड में ऐसे काफी हिस्से हैं. मुझे अब भी याद है वो खटारा बस और वो वो हांफता हुआ आदमी. शायद किसी गाँव से चल के हाईवे तक आया था और जब कंडक्टर ने बैठाने से मना कर दिया तो वो बोला था, “फर्श पर बैठ के चला जाऊंगा, बस अन्दर आने दीजिये, देहात में यातायात का कोई और साधन नहीं है साहब.” एक पुराने कपड़ों और मैली शर्ट वाले आदमी से मुंह से अच्छी हिंदी सुनकर शायद बसवाले के शहरीपन को झटका लगा था. उसको आने दिया था कुछ पैसे लेकर. शायद उसकी आँख में आंसू था या ऐसी कल्पना हुई थी. पता नहीं.

आज से दसेक साल पहले मध्य प्रदेश राज्य सड़क परिवहन की खस्ताहाल बसें सीमावर्ती उत्तर प्रदेश से हमें जोड़ती थीं. पर फिर वही हुआ जो हर सरकारी संस्थान का होता है. भ्रष्ट लोगों ने पैसे खा लिए और राज्य परिवहन डूब गया. अब छतरपुर से महोबा या झाँसी जाने के लिए प्राइवेट बसें ही बची हैं. हाल कुछ ख़ास नहीं बदला है. आपको छतरपुर से झाँसी जाना है तो बैठ जाइये अपनी बस चुन कर. ये निर्धारित समय से आधे घंटे देरी से निकलेगी. टिकट इतनी आसानी से नहीं मिलेगा. पहले बस के आगे देखिये. एक हुक्मरान बैठे होंगे. उनसे दरख्वास्त कीजिये. अगर आपकी पहुँच और रसूख है तो आपको आगे की सीट मिलेगी वरना पीछे बैठिये. आखिरी वाली सीट में पांच की जगह होती है और बैठते सात हैं. बस चलने पर सबसे पीछे बैठे लोग हर धचके पर उछलते हैं. जिगर चाहिए लोहे का. बस चलने में वक़्त हो तो बाहर खड़े हो कर इंतज़ार कर सकते हैं. सीट पर रुमाल या बैग रख कर बाहर आ जाइये. अन्दर घुटन, पसीने और मल-मूत्र की सुगंध फैली होगी इसलिए अगर आप रोजाना के बस यात्री नहीं हैं तो चक्कर खा के गिरने से अच्छा है बाहर आ जाइये. जब बस चले तो बैठ सकते हैं. बस के शीशे खुले होते हैं तो चलने पर हवा से सारी बदबू बाहर निकल जाती है और पसीना सूख जाता है. लोग एक दूसरे से फालतू बात करने लगते हैं, मूंगफलियाँ फोड़ के खाने लगते हैं, छिलके बस में गिराने लगते हैं. अस्वच्छ भारत अभियान के तहत.

जी हां ये हाल अब है. और यही हाल आज से दस साल पहले था. भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा है हमारा बुंदेलखंड. ये प्राइवेट बसों ने एक नया तरीका इजाद किया है इन सालों में आपको परेशान करने का. और इसके पीछे जो भी दिमाग है उसको सलाम. तरीका ये है कि ये बिठाते सवारी झाँसी तक की हैं और औकात इनकी मउरानीपुर तक की होती है. उसके आगे का परमिट नहीं होता या मन नहीं होता, पता नहीं. तो आप बैठे हैं इनकी बस में और आधे रास्ते में ही इनका टायर बोल जाएगा. टायर को कुछ नहीं हुआ है, इन्हें आगे जाना नहीं है. फिर ये अपनी सहयोगी बस को बुला के आपको उनमें ठूंस देंगे. दो बसों की सवारी अब एक बस में समा जाएगी. ये कुदरत का करिश्मा है या भगवान की लीला – आप ही फैसला कीजिये.

चलिए ये सब तो भ्रष्ट लोगों की बातें हैं. कुछ अच्छी बात करते हैं. तो बुन्देलखंड में आता है एक क़स्बा नाम है मउरानीपुर. यहाँ धूल उड़ती रहती है, टूटी फूटी सड़कों से ट्रक, बसें और अन्य निजी वाहन निकलते रहते हैं. लोग यहाँ सर पर गठरी रखे, बीवी बच्चों के साथ एक खाली बस का इंतजार करते हैं. खाली बस तो कभी आती नहीं. भरी बस में ही लोग भरते जाते हैं. बस भी हर गड्ढे में आड़ी-टेढ़ी होती, चूं-चां करती चलती जाती है. बसें निकलती हैं तो यहाँ रुकने की जगह भी बनी है. एक दो टपरियाँ हैं जहाँ दिनभर गरम गरम समोसे और मंगोड़ियाँ छनते रहते हैं. बस यहाँ रूकती है तो सब आदमी बाहर टहलने लगते हैं. औरतें बस में ही घूंघट काढ़े बैठी रहती हैं. आदमी समोसे की दुकान पे मंगोड़ी उठा के कहता है कैसी दी? और दुकानदार दाम बता के सौ ग्राम तौल देता है. आदमी एकाध मंगोड़ी खा कर बाकी अपने बीवी बच्चों को पकड़ा आता है. सब चाय सुड़कने लगते हैं और मनोरम दृश्य बन पड़ता है. धूल में नहाई बस. पान की पीक से सजी हुई. चाय सुड़कते लोग. रास्ते पे पड़े चिप्स के पैकेट और मंगोड़ी को हरी चटनी में डुबो कर खाते बच्चे. गोधूली बेला में सब शांत और मंगलमय लगता है. मंगोड़ी खाने से हिचकी लगती है फिर पानी पीते हैं.

और फिर बस चल पड़ती है. आधी जंग जीत कर. तैयार हो कर. वापस सब बैठ जाते हैं अपनी अपनी जगह. बस घुस जाती है वापस उस धूल के गुबार में. इतनी हताशा, और गन्दगी के बीच भी बीसों साल से ये बस चली आ रही है. पैसे खाए जा रहे हैं, चेक पोस्ट, नाकों पे रिश्वत के नाम पे चालीस रुपया लिया जा रहा है. देहात का आदमी फुटबोर्ड पे बैठ के सफ़र करता चला जा रहा है, चला जा रहा है. अश्रु स्वेद रक्त से… लथपथ, लथपथ, लथपथ.

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