कहानी – दिल्ली में पाकिस्तानी

सन् 2007 में वो पाकिस्तान से भारत आया था. बलूचिस्तान के क्वेटा का रहने वाला मुकेश जब दिल्ली पहुंचा तो उसके चाचा ने उसकी बड़ी मदद की. एक टैक्सी ले के दी और अपनी ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम पे भी रखा. मुकेश दिल्ली में टैक्सी फिराता रहता और ग्राहकों से बात करता. कोई अगर पूछ लेता कि आप कहाँ से हैं तो मुकेश बड़े गर्व से पाकिस्तान का नाम लेता. उसकी आवाज़ में कोई हिचक या डर न होता. ग्राहक भी उसकी कहानी को शौक से सुनते और उसकी साफ़ ज़ुबान की तारीफ़ करते. मुकेश हिंदी नहीं पढ़ सकता था. उसने उर्दू में मास्टर्स तक की पढ़ाई की थी और वो उर्दू में ही बात करता था. हिंदी उर्दू में फर्क कुछ न होने की वजह से उसको कभी बोलने-समझने में तकलीफ नहीं हुई.

ये सच है किस्सा नहीं. मैंने बीते शनिवार उबर की टैक्सी ली और मुकेश से मेरी मुलाकात हुई. बात छोटी सी है पर फिर भी आपसे साझा कर रहा हूँ. मुकेश ने बताया कि कई बार ऐसा होता है कि रात को दो तीन बजे शराब के नशे में धुत लड़कियां उसकी टैक्सी में आ बैठती हैं. वो बता रहा था कि ऐसे में वो अपना फ़र्ज़ समझता है कि उन्हें खैरियत से घर पहुंचा आये. लड़कियों ने उसको चुना, इसका मतलब यह नहीं कि उन्होंने उसको किसी किस्म का मौका दिया. इसका मतलब ये, बकौल मुकेश, कि उन्होंने उसको ज़िम्मेदारी दी. उसको अगर किसी महिला सवारी के लिए उल्टा चक्कर लगा के, नुक्सान उठा के, दो तीन किलोमीटर एक्स्ट्रा भी जाना पड़े तो वह संकोच नहीं करता.

मुकेश बता रहा था कि कभी कभी लड़कियां गाड़ी में म्यूजिक तेज़ कर के शीशे नीचे कर के हवा खाती हुई जाती हैं. वो ये सब उन्हें करने देता है, हालाँकि एहतियात बरतते हुए. उसका कहना है कि यदि कोई सवारी खुश हो के जाएगी तो वो उसके लिए ही अच्छा है न. पाकिस्तान से, बलूचिस्तान से दरख्वास्त है कि थोड़े और मुकेश भेज दें.

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