पासपोर्ट साइज़ फोटो

अभी हाल में एक इंटरव्यू दिया. इंटरव्यू में पासपोर्ट साइज़ फोटो ले के आने बोला था. अब अपनी हर मेज की हर दराज की ख़ाक छान ली पर कोई पुरानी फोटो नहीं मिली. इसका एक ही निष्कर्ष निकला – नयी फोटो खिंचवानी पड़ेगी. जिसका डर था वही हुआ. सब फोटो इधर उधर दे के ख़त्म हो गयीं. एक तो ये समझ नहीं आता की चाहे जितनी पासपोर्ट फोटो खिंचवा लो, सब एकाध साल में ख़तम कैसे हो जाती हैं. पता ही नहीं चलता आपका ये चौखटे में कैद थोबड़ा कहाँ कहाँ चस्पा हो जाता है. बहरहाल, हम चल दिए फोटो खिंचवाने.

फोटो स्टूडियो वाले भैया का अलग ही जलवा होता है. लोग आते जाते हैं, और फोटोग्राफर धैर्य के साथ हर प्रकार की शक्ल को कैमरे में क़ैद कर के, थोड़ा गोरा कर के, दाग धब्बे, कील – मुंहासे हटा के, विक्को टर्मरिक, नहीं कोस्मेटिक, विक्को टर्मरिक, ये है आयुर्वेदिक – टाइप का काम करते हुए, फोटो निकालते रहते हैं. मैं जब पहुंचा तो देखा एक बच्चा मुझसे पहले आया हुआ था. फोटोग्राफर से बोल रहा था, “भैया मुझे इन कपड़ों में फोटो खिंचवानी है.” फोटोग्राफर का हास्यबोध अपने चरम पर चल रहा था. फोटोग्राफर बोला, “नहीं, इन कपड़ों में नहीं खींच सकते. जाओ चड्डी बनियान पहन के आओ.” बच्चा सकपका गया. उसके साथ आया दूसरा बच्चा हंसा तो वो भी हँस दिया. पर उसकी समझ में मज़ाक आया नहीं. वो सचमुच डर गया था कि चड्डी बनियान में खिंचवानी पड़ेगी. बच्चे को तभी भरोसा हुआ जब फोटोग्राफर ने उसको अपने स्टूल पे बिठाया. ये फोटो खींचने वाला स्टूल भी एक अलग ही तरह की जगह होती है. एक ऐसी जगह जहाँ हर तुर्रमखां की सिट्टी पिट्टी गुल हो जाती है.

आप स्टूल पे बैठिये. आपके दोनों तरफ दो सफ़ेद छाते होंगे जिनमे बल्ब लगे होंगे. बल्ब से आपका चेहरा रोशन हो रहा होगा. फोटोग्राफर अपना तोप जैसा कैमरा ले कर आपके मुंह पे फोकस करेगा. आप इस माहौल में सबसे मूलभूत चीज़ें जैसे मुस्कुराते कैसे हैं, गर्दन कैसे रखते हैं, हाथ कहाँ रखते हैं – ये सब भूल जाएँगे. फिर जब फ़्लैश चमकेगा तो आपकी आँख पे चमक लगेगी और आप चकाचौन्ध में अँधा महसूस करेंगे. बस इसी आपाधापी में अगर अच्छी फोटो खिंच गयी तो ठीक, वरना यही मुंह ले के अपने पासपोर्ट, अपने सिम कार्ड एप्लीकेशन, अपने आधार कार्ड, अपने पैन कार्ड में लगाइए.

बच्चे ने फोटो खिंचवाई. उस फोटो को देखकर मैंने किसी तरह हंसी रोकी. ऐसा लग रहा था कि किसी शावक पे शेर हमला करने वाला है और उसने भयभीत हो कर जो पोज़ दिया है, वही ये है. मैंने सोचा कि मेरा तो अनुभव है. इस बच्चे से तो अच्छी ही खिंचवाऊंगा. बस यही तो गलती कर दी. अति आत्मविश्वास हमारे पतन का कारण बना.

पहले फोटोग्राफर ने हमें स्टूल पे बैठाया. हमने देखे दोनों छत्ते, और तोप जैसा कैमरा. फिर हमने पोज़ दिया. फोटोग्राफर दौड़ के आया कि भैया जे क्या कर रहे हो? उसने हमारी मुंडी नीचे की, गर्दन को सीधा किया और वापस गया. जब तक वो वापस पहुंचा, दुर्गा माँ की कृपा से हमारी एक आँख छोटी और एक बड़ी हो चुकी थी. वो बोला की यार ढंग से रहो. हमने आँख ठीक की तो आँख से पानी आने लगा. वो बोला, पलक झपक लो यार. हमने पलक झपकी तो आँख खुले ना. यार ये आँख खोलना तो बेसिक होता था. फिर हमने किसी तरह मुंह बनाया तो फोटोग्राफर बोला हल्का मुस्कुरा दो. अब यार क्या क्या करें. हमनें जैसे ही मुस्कुराया, आँखें बंद हो गयीं. फोटोग्राफर की दाद देनी होगी वो झुंझलाया नहीं. मतलब दिखाई नहीं झुंझलाहट. फिर उसने हमको कहा कि सिर्फ आँखें खोल लो, बाकी सब रहने दो. हमने आँख खोली तो गर्दन टेढ़ी हो गयी, और एक आँख छोटी हो गयी. उसने कहा बस हलकी सी गर्दन बाएँ मोड़ो, और हमने जैसे ही मोड़ी तो लचक आ गयी. अब ये दिखाना तो भारी शर्मनाक होता कि गर्दन की नस चढ़ गयी है तो हम दर्द में बैठे रहे. उसने खींच ली.

फिर उस फोटो को उसने गोरा किया. हमने कहा कि यार इतना भी गोरा न करो के पहचान न आएं. हमारी शकल की सारी निशानियाँ मिटा के उसने प्रिंटआउट निकाला. पंद्रह फोटोज़ की कीमत थी सौ रूपए और अपने पे विश्वास. ये कीमत चुका के, फोटो ले के अपन वापस आ गए.

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