भारतीय रेल पे बकवास

आप कितने भारतीय हैं, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि आप रेल के सफ़र में कितना सहज महसूस करते हैं. भारतीय रेल आपको असहज होने के खासे मौके देती है पर यदि आप उनके इतने आदी हो चुके हैं कि आपको कोई फर्क नहीं पड़ता तो, आप भारतीय हैं.

आपका अनुभव भी ट्रेन में हर स्टेशन, हर शहर अलग अलग होता है. कुछ शहर अपनी छाप अपने स्टेशन से ही छोड़नी शुरू कर देते हैं. अगर आपकी ट्रेन मथुरा रुकी है तो ऐसा कुछ होगा कि कोई बालों में तेल लगाये सज्जन आएँगे और आपकी आरक्षित स्लीपर सीट पर पसर जाएँगे. आप कहेंगे की अरे अरे भाई साहब, ये मेरी सीट है तो वो कहेंगे कि ये तेरा मेरा क्या है? दिन का समय है, ये आगरा मथुरा का इलाका है, हमारा डेली का पास है. एडजस्ट करो. फिर आपके अखबार का कोई पन्ना मांग लेंगे और आप एडजस्ट करेंगे. आपने उन्हें बैठने से रोका था ये आपकी गलती थी ऐसा जताया जाएगा और आप पे ऐसी नज़र डाली जाएगी कि इलाके में नया है शायद. सीख जाएगा.

इस से भी बुरा आपके साथ तब होगा यदि आप अपनी सीट पे दिन के समय लेटे हुए हैं. पहले आपके पैरों के पास हलचल होगी. आप हलकी सी आँख खोल कर देखेंगे तो आपकी सीट पे कोई आपकी टांग खिसका कर जगह बना रहा होगा. आप सोचेंगे कि ये क्या मजाक है तो ये मजाक नहीं यूपी है. फिर आपको ये सफारी सूट पहने सज्जन समझाएंगे कि दिन के वक़्त सोना नहीं चाहिए. फिर धीरे धीरे एक हुजूम गाड़ी में घुस जाएगा और आप अपनी ही सीट पे कोने में बैठे होंगे. टीटीई की चिंता मत कीजिये. ये उसको पचास रुपया पकड़ा देते हैं और वो आगे बढ़ जाता है.

और दूसरी तरफ ट्रेन में बेचने वाले घुस आएँगे. “आगरा का पेठा, मथुरा का पेड़ा” का शोर चहुँ ओर गूंजेगा. अगर कोई हिजड़ों का दल ट्रेन में घुस आये और आप कुंवारे पुरुष यात्री हैं तो ऊपर की बर्थ पे सांस रोक के दम साधे पड़े रहिये. अगर आपकी किस्मत रही तो ये आपको नज़रंदाज़ करके निकल जाएंगे पर अगर आप इनके लपेटे में आ गए तो ये आपके साथ ऐसी बदतमीजी कर के जाएँगे के इनके जाने के बाद आप अपने सहयात्रियों को मुंह दिखने के काबिल नहीं रह जाएँगे.

हर स्टेशन का अपना अलग जायका है. कानपुर की तरफ अगर आपकी गाड़ी रूकती है तो बकवास का लेवल बढ़ जाएगा. कानपुर की हवा में शोरगुल है. पर ये भीड़ और धक्का मुक्की वाला शोर नहीं. ये ठहाकों और गप्पों का शोर है.

झाँसी में आवाजें नहीं, कहकहे होंगे और यहाँ के पानी में कुछ ऐसी बात है कि सबकी आवाजें बुलंद होंगी. ट्रेन में चढ़ने वाले एक दूसरे को ऐसे आवाज़ देंगे जैसे सामने वाला दस किलोमीटर दूर खड़ा है.

एसी कोच की बात अलग है. यहाँ उतना शोरगुल नहीं है. लोग पर्दा लगा के अपने में मस्त हैं. ज्यादा बात नहीं करते. ऐसे में मथुरा आगरा वालों का तो हाजमा ही बिगड़ जाता है. ट्रेन का मज़ा उसी में है कि पंगत बैठे, मूंगफलियाँ और चने खाए जायें और जीवन भर संपर्क में रहने के वादे किये जाएं. फिर चाहे यात्रा ख़तम होते ही मैं कहाँ तू कहाँ.

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2 comments

  1. I usually get a train of Vaishno devi (Jammu Mail) for home town. In this people starts singing Bhajans after its departure and it continues till 2AM In the morning and starts again after 4 AM. So annoying. 😛

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