गर्मियों पे बकवास

याद है जब गर्मियाँ उतनी गर्म नहीं होती थीं? मतलब होती तो गर्मी थी पर आप एसी नहीं चलाते थे? कूलर में एक छेद होता था जिस से रबर का पाइप डाल के पानी भरते थे. डेजर्ट कूलर बड़ा सा लोहे का डब्बा होता था और उसके दरवाज़ों में खस की टाट लगी होती थी. फिर जब कूलर चलता था तो कुछ सुनाई नहीं देता था.

रसना का एक डब्बा आता था जिसमे सारे घर के लिए शर्बत बनता था. एक पतीली में सारा घोल तैयार करके, फिर जग में उड़ेल के, गिलासों में डाला जाता था. या फिर कुछ ख़ास दिनों रूह अफज़ा बनता था, या लस्सी बनती थी. और जब मम्मी को ज्यादा प्यार आया हो और बुआजी, चाचीजी या ताईजी आईं हों तो सबके लिए मैंगो शेक बनता था. कांच के गिलासों में शरबत शिकंजी डाल के, ऊपर से हर गिलास में दो दो बर्फ के टुकड़े डाले जाते थे. अगर आप शरबत निकाल रहे होते थे तो अपने में बर्फ ज्यादा गिरा लेते थे. जब गिलास से सारा शरबत साफ़ हो जाता था तो बर्फ खिसक के आती थी और ज़बान पे पिघलती थी. हलके से बर्फ को चबा के डकार ली जाती थी.

फिर फर्श पे बिछी दरी पे पूरा परिवार पसर जाता था. कूलर वाले कमरे में अँधेरा सा होता था. सब सो रहे होते थे. खासकर सारे पुरुष घोड़े बेच कर सो रहे होते थे. छुट्टी का दिन गर्मियों में खुशकिस्मती की बात होता होगा उनके लिए. आप और आपके भाई बहन जाग कर बात करने की कोशिश करते तो डपट कर सुला दिए जाते थे. एकदम से लाइट जाने पे आप सब जाग जाते. बच्चों को कमरे से सटकने का बहाना मिल जाता. घर में दौड़ लगाने का बहाना मिलता. यहाँ से वहां. कूदा-कादी, दौड़ – भाग. छुपन छुपाई खेलते हुए, धप्पा करने का अलग की रोमांच होता.

जिसपे दाम होता वो जब कमरे में दाखिल होता तो हर किसी की धड़कनें बढ़ जाती. जो आइस पाइस हो चुका होता वो मुनादी करता चलता कि छुप जाओ सारे. पलंग के नीचे, दरवाज़े के पीछे – धड़कनें बढ़ी, सांसें चढ़ी. और ये धप्पा. “नहीं पहले आइस पाइस बोल दिया था.” हंगामा. शोर को सुन के कोई बड़ा तमतमाता. पर बच्चे तो मशगूल.

दादी हाथ पंखा ले कर बैठी होतीं थीं. हाथ से पंखा झलना उतना अखरता नहीं था. गर्मियां अखरती नहीं थी. पसीना सूख ही जाएगा, अगर हाथ पंखा नहीं है तो अखबार ही झल लो. हलकी हवा जब दादी को लगती तो ढेरों आशीर्वाद मिलते. फिर दादी आपका हाथ रोक देतीं कि आप थक ना जाएं.

गर्मियों में पत्रिकाएँ भी ज्यादा अच्छी मिलतीं. कॉमिक्स के सारे विशेषांक गर्मियों का ही इंतजार करते. नागराज, डोगा, ध्रुव, परमाणु सब गर्मियों में धमाकेदार कारनामें करते. आप बिना पंखे के नीचे बैठे, पसीना बहाते बहाते भी ये सब पढ़ सकते थे. गर्मी तब भी होती पर महसूस नहीं होती.

शाम होने के बाद लाइट का जाना और भी सुखमय होता. सारे लोग, छत पर इकठ्ठा होते. सारे सगे, चचेरे, फुफेरे भाई बहन छत पर – कोई लड़ता हुआ, कोई क्रिकेट खेलने के लिए टीम बांटता हुआ, कोई छत की दीवार फांदने की टाक में और कोई अपनी धौंक में. घर की औरतें चटाई बिछा कर बैठी हुईं – कहीं बालों का रिबन, कहीं क्लिप. चटाई पे गंदे पैरों से चढ़ते बच्चे, कोई पड़ोसी के घर से आती प्रेशर कुकर की आवाज़. पड़ोसी भी अपनी अपनी छतों पर बैठे दिख जाते. गाहे बगाहे आवाज़ भी दे दी जाती, हाल चाल भी ले लिया जाता.

आकाश में तोतों का झुण्ड कलरव करता हुआ उड़ता जाता. एक के बाद एक झुन्ड और चारों ओर कांय कांय. गर्मी में दिन घर में अलसाते बीतता और शामें ऐसे खूबसूरत पलों से बनतीं. रात में फ्रिज से बोतल ला कर छत पे रख दी जाती, गद्दे बिछा के सब छत पर ही सो जाते. सवेरा होता तो सूरज की मद्धिम किरनें हमें गुदगुदा कर उठातीं और धीरे धीरे नुकीली होती जातीं. और फिर वही सब – रूह अफज़ा, छुपन छुपाई, कूलर और दुपहरी की नींदें.

चम्पक, चंदामामा, नंदन, बालहंस से भरी हुई दुपहरें. मुझे तो याद नहीं की गर्मियां पहले कभी खराब लगती थीं.

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