लेख – आम तो अब हर मौसम मिले हैं

फलों के राजा को एक सलाम. आम की महिमा में एक छोटी सी वंदना.

वैसे मैं फलों के ठेले पे कभी रुकता नहीं. संतरे, मौसंबी कोई खरीदने की चीज़ नहीं हैं, अनानास भी दांत खट्टे ही करता है. अनार खाने की मेहनत अपन से होती नहीं. और पपीते की गंध नहीं पसंद. कभी जभी चार पांच केले ले लेते हैं ये बताने के लिए कि हम भी फल खा सकते हैं. पर आम का मौसम आते ही ये नियम सब टूट जाते हैं.

ये जो विज्ञापन होते हैं न कि आम अब हर मौसम मिलेंगे – माजा पियो, फ़्रुटी पियो – ये सब बकवास हैं. भाई, आम आम है. जब तक ठेले पे जा के सफेदा, बादामी, दशहरी, तोतापुरी, सिन्दूरी नहीं टटोले, और हर किस्म का स्वाद नहीं लिया, तबतक आपकी आम की नॉलेज निल बटा सन्नाटा ही कहलाई.

आम शुरुआत में आते हैं सफेदा, बादामी – ये सबसे खूबसूरत किस्में हैं. बादामी को हमारे एम पी तरफ बादाम आम कहते हैं. बादामी का नाम शायद कर्णाटक के वातापी/ बादामी क्षेत्र पे पड़ा है. खाने को तो कोई भी आम पिलपिला कर के ऊपर की टोपी तोड़ के चूसा जा सकता है पर कुछ आम की किस्में थोड़ी इज्ज़त मांगती हैं. बादाम, सफेदा वगैरह को चाकू से काट के खाना चाहिए. हल्का चाकू पड़ते ही, रस से भरा ये आम टपकने लगता है. हल्का खट्टापन इसका एक मुंह में करंट सा लगाता है. असली आम प्रेमी मेरी बात समझ रहे होंगे. नकली वाले माजा पी रहे होंगे.

सफेदा भी रसभरा होता है. आकार में थोड़ा छोटा और स्वाद में थोड़ा और खट्टा पर इसका अपना मज़ा है. सिन्दूरी के सर की तरफ लाल रंग होता है. इसमें रेशा ज्यादा होता है.

मतलब अल्फोंसो या हाफुज़ आम भी ठीक है पर ऐसा भी कोई राजा वाजा नहीं है. लकड़ी के फट्टों वाले डब्बों में रखा हापूस आम आम आदमी को मुंह चिढ़ाता रहता है. पर बात ये है की सौ रूपए किलो वाला बादाम और सौ रूपए नग वाले हापूस में कोई ख़ास अंतर नहीं है. बल्कि मुझे तो बादाम और सफेदा कहीं ज्यादा अच्छे लगे.

ज्यादा मीठा खाना है तो थोड़ा और इंतज़ार करिए. दशहरी और चौसा काफी मीठे होते हैं. चौंसा खट्टा होता है. चौसा और चौंसा में फर्क है. गूगल कर लेना. नीलम और लंगड़ा का भी अपना महत्त्व है.

आम की कई प्रजातियाँ हैं और सबका अपना अपना स्थान है. पर आम खाने का एक ही तरीका है. एकदम गंवार तरह से खाने का. आम तमीज से खाने वाली चीज़ नहीं है. चम्मच कांटे से फांक तो फिर भी खा लोगे. गुठली कैसे खाओगे? गुठली तो चूस के ही खाई जाती है. रस चिपचिपा गिरता रहता है. आम खा लेने के बाद आपकी आत्मा से चिपक जाता है. इसका स्वाद देर तक डकार में आते रहता है मानो भगवान् पूछ रहे हों कि कहो गुरु, इंसान होने का मज़ा आया?

आम खरीदने वाले भी बड़े अलग होते हैं. बाकी फल एक दो किलो लिए जाते हैं. असली आम के चाहने वाले पांच किलो ला के घर में पटक देते हैं. और डिनर के वक़्त सबकी थाली में एक एक आम की फांक आ जाती है. फिर और आम कटता है और बंटता है. दोपहर में आँगन में खड़े हो के आम चूसे जाते हैं. रस गिरता जाता है. कपड़ों पे ना गिरे इसलिए आम होली के कपड़ों में या अर्धनग्न हो के खाया जाए तो बेहतर. आम खाना भी एक ध्यान का काम है. कोई रेशा न बेकार जाये, रस की हर बूँद चाट पोंछ के निपटाई जाये.

बताते हैं कि आम खाने के लिए पहले लोग बाल्टी में पानी भर के उसमे आम डाल के आँगन में रख देते थे और घरवाले उसके चारों तरफ बैठ के तब तक खाते थे जब तक पेट न भर जाये. आम से ज्यादा भारतीय फल कोई नहीं है. गर्मियों में मेंगो शेक का भी अपना रुतबा है. मेंगो शेक में डालते ही रूह अफज़ा भी क्या से क्या बन जाता है. सुनते हैं की ज्यादा आम खाने से मुंहासे निकल आते हैं. अगर आम खाने की ये सजा है, ग़ालिब, तो हमें मंज़ूर है.

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s