गोविन्दपुरी में ठेले पे बकवास

दिल्ली खाने पीने के लिए धांसू शहर है. आप यहाँ मूलचंद के परांठे से ले कर पुरानी दिल्ली के समोसों तक और सूशी से ले कर बर्गर तक हर चीज़ बड़ी आसानी से खा सकते हैं बस मन में आस्था और विश्वास होना चाहिए. खिचड़ी दलिया बस मत मांगिये. दिल्लीवालों का पेट दाल मखनी, राजमा और कढ़ी से भरता है. यहाँ आपके लिए जगह जगह पूरी और छोले और चावल के ठेले लगे हैं. कई जगहों पर मुफ्त खाना बंटता रहता है तो आप यहाँ भूखे तो नहीं सो सकते.

एक बार गोविन्दपुरी मेट्रो स्टेशन के सामने से निकलते हुए मैंने एक जगह लिट्टी चोखा लिखा हुआ देखा. मुंह में लार बन गई पर उस वक़्त कहीं जाना था तो उस लिट्टी चोखा के ठेले को मन के किसी फोल्डर की किसी फाइल में सेव कर लिया कि बाद में आकर धावा बोला जाएगा. कुछ दिनों बाद, शाम का वक़्त था – लोगों को ऐसे में दोस्तों यारों की याद आती है, मुझे लिट्टी की याद आ गयी.

जिन्हें नहीं पता है उन्हें बता दूँ की “लिट्टी चोखा” बिहार झारखण्ड मिथिलांचल पूर्वांचल और नेपाल में भारी मात्रा में ठूंसा जाने वाला व्यंजन है. लिट्टी एक तरह से बाटी की बहन है जिसके अन्दर सत्तू होता है. और चोखा समझ लीजिये आलू का भुरता जिसमें थोड़ी मसालों की शान-ओ-शौकत आ गयी हो. घी में भीगी हुई लिट्टियाँ और मिर्च से भरपूर चोखा – तृप्त कर देते हैं एकदम. थोड़ी याद दाल बाटी की भी आ रही है पर उसपे कभी और लिखेंगे.

तो जब हम लिट्टी के ठेले पे पहुंचे तो दुकानदार आटे की लोइयां बना बना के एक ग्रिल के किनारे पे रखता जा रहा था. ग्रिल के नीचे अंगारे दहक रहे थे. ग्राहक के “एक प्लेट देना” कहने पर वह उन लोइयों को, जो थोड़ी कुरमुरी हो गयी होती थीं, चपटा कर के ग्रिल के बीचों-बीच खिसका देता. फिर वो पूरी ही कुरमुरी हो जातीं. क्रिस्पी के लिए हिंदी में “करारी” शब्द है. पर दिल्ली में करारी का मतलब स्वादिष्ट होता है. शायद पंजाबी में ये अर्थ होता हो.

कुछ ऐसे और शब्द हैं जिनकी ऐसी तैसी हो जाती है जब हिंदी और पंजाबी आपस में टकराते हैं.

एक शब्द है स्वाद जिसका अर्थ है टेस्ट. और एक शब्द है स्वादिष्ट जिसका अर्थ है टेस्टी. पर यहाँ पर स्वाद मतलब टेस्टी. “राजिंदर के ढाबे का चिकन बड़ा स्वाद है.” अरे यार स्वाद नहीं है, स्वादिष्ट है.

एक और शब्द है “ज्योतिष” जिसका मतलब है पामिस्ट्री. और एक शब्द है ज्योतिषी मतलब पामिस्ट. पर यहाँ पर ज्योतिष मतलब पामिस्ट. “किसी अच्छे ज्योतिष को दिखाओ” अरे यार ज्योतिष नहीं, ज्योतिषी को दिखाओ. वैसे ज्योतिषी को भी मत दिखाओ. सब ढकोसला है.

बहरहाल, हमने भी बोला एक प्लेट देना. वह ऐसे काम करता रहा जैसे उसने सुना ही न हो. हम खड़े रहे. उसने बिना हमारी तरफ देखे, प्लेट लगा कर हमारी ओर खिसका दी. आस पास समोसा कचौड़ी के ठेले थे. लोगों को वहां जाता देख उसने आवाज़ दी – “लिट्टी खाओ, चोखा खाओ, अच्छी चीज़ खाओ.” तेल में डूबे, हार्ट अटैक के स्त्रोत पकवानों को काफी बुरा लगा होगा. चोखे में उसने दो तरह की चटनी, प्याज़, नीम्बू सब डाला. मतलब बीस रूपए के हिसाब से काफी धांसू आइटम.

बगल के ठेले पे अंडा और ऑमलेट बिक रहा था. अधिकतर पुराने खरीदार खड़े थे. उधारी में काम चल रहा था. अंडे वाला भी खिलाए जा रहा था. पैसों की चिंता नहीं थी. अक्सर ठेले वालों के दिल का साइज़ होटल वालों के दिल से बड़ा देखा गया है. एक्स्ट्रा चोखा दे देते हैं, बगल में एक साउथ इंडियन ठेला है वहां लोग भर भर के सांबर लेते रहते हैं एक प्लेट इडली ही ली हो चाहे. होटल में एक दो बार के बाद बैरा बोल देता है की अब अतिरिक्त राशि देनी होगी. मेरा मतलब एक्स्ट्रा कॉस्ट होगा. पर ठेले पे दिलदारी, उधारी चलती है.

ऑमलेट के ठेले पे एक आदमी दूसरे से छेड़ खानी कर रहा है. दूसरा आदमी तैश में आ के उसको ढंग से रहने बोलता है. सारे मुस्कुरा रहे हैं. मुझे लगा की मारपीट होगी पर नहीं, ये अंडे का ठेला मधुशाला से कम नहीं है. यहाँ हिन्दू मुस्लिम भाई-भाई वाला हिसाब है. रशीद मियां ऑमलेट ले जा रहे हैं उधारी में. ठेले वाले का नाम सुनील है. जिससे पंगा हुआ उसका नाम अमर है. सुलह जिसने कराई वो अकरम था.

थोड़ा आगे चल के गन्ने के जूस का ठेला है. एक चक्का है जो डीजल की मोटर से भक भक करके चल रहा है. उस से लगी मशीन है जिसमे गन्ना निचोड़ा जा रहा है. गर्मियों में गन्ने का रस अमृत सामान लगता है. पर अमृत देने वाले भैया को अमृत बांटने में कोई विशेष रूचि नहीं है. कुछ लोग दाम पूछते हैं एक गिलास का तो गन्ने वाला जवाब नहीं देता. मगन है. ग्राहक चले जाते हैं. दुकानदार ने कोई लिफ्ट नहीं दी. हमने दाम न पूछ कर, सीधे बोला एक दस रूपए का गिलास लगाओ. उसने लगा दिया. हमने पी लिया.

आगे और भी ठेले हैं. गोविन्दपुरी में सस्ता खाना प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है. राजमा चावल, कढ़ी चावल, समोसे, डोसा, इडली, लिट्टी चोखा – सब मिलेगा. एक ही गली में – राजमा से ले कर सांबर तक – पूरा देश लांघ जाएँगे. आइये कभी.

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