छतरपुर पे बकवास – भाग एक

छतरपुर को शहर कहना उचित नहीं होता और क़स्बा भी नहीं कह सकते. यहाँ बगल में खजुराहो एअरपोर्ट सालों से है, दूर दूर से लोग आते हैं. पर ट्रेन अभी आई है. यहाँ की बोली बुन्देली है और लोग मीठे हैं.

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बुन्देली को बोल कर नहीं बल्कि गा कर इस्तेमाल किया जाता है.

“काए काSSSS हो रओ? कहाँSSSSSS जा रए?”

बुन्देलखंडी आदमी अधिकांश पेड़ के छांव में चाय की टपरी पे चाय पीते और महुआ छेवले की देते* पाया जाता है. “बो हमसे नाटक दे रओ हतो तो हमने दओ मिला के.”

छतरपुर में लोग संतुष्ट हैं. दस साल इस शहर को छोड़ के चले जाइये. दुनिया ऊपर से नीचे हो जाएगी पर ये महाराजा छत्रसाल की नगरी जस की तस रहेगी. विकास के नाम पे शहर में ट्रैफिक लाइटें अभी आई हैं. अगले दस साल में हम इन्हें फॉलो करना सीखेंगे.

शहर में आजकल रोड पे चलना मुश्किल है. अगल बगल से डग्गामार* तेज़ी से सांय सांय करती निकल जाती हैं. ड्राईवर आधा गाड़ी से बाहर लटक के चला रहा होता है. लोग गाय बकरी की तरह धंसे होते हैं. और एक और नयी प्रजाति ने भी शहर पे हमला बोला है. इसका नाम है चुरकट प्रजाति. यह चिरकुट प्रजाति की तरह हीहोती है पर थोड़ी सी भिन्न. इस प्रजाति के लोग अभी बाल्यावस्था या तरुणावस्था में होते हैं. इनके माँ बाप इन्हें बाइक ले देते हैं और ये हरे पीले बाल करके, मुंह में राजश्री भर के, तेज़ी से ट्रैफिक में बाइक रगेदते हुए निकल जाते हैं. ये भीड़ में हॉर्न दे दे के आपके कानों के पर्दों के जीवन काल को शीघ्रातिशीघ्र विराम देने का प्रबंध कर देते हैं. मेरा मतलब इनके भोंपू से आप बहरे हो सकते हैं.

छतरपुर में घूमने के लिए पर्याप्त जगहें हैं. जैसे के आपके घर की छत. आपके घर की बालकनी, आपके मोहल्ले की सड़क. बस. पार्क और तालाब वाला सिस्टम हमारे शहर के लिए पुरानी टेक्नोलॉजी हो चुका है जिसको शहरवासी कबका ठुकरा चुके हैं. एक बड़ा तालाब और एक रानी तालाब है महाराजा छत्रसाल के ज़माने का. पर ये घूमने जाने की जगह नहीं है. ये वो जगह हैं जहाँ आप महीनेभर की पूजा का कचरा जैसे अगरबत्ती की राख, पुराने दिए, जली हुई बातियाँ, और खंडित मूर्तियाँ ये सब एक पॉलिथीन में भर के फ़ेंक के आते हैं.

मज़ाक कर रहा हूँ. छतरपुर में ऐसा नहीं हैं कि बाहर जाने के लिए जगह ही नहीं है. एक जगह है. हनुमान टोरिया. ये एक पहाड़ी जिसपे ऊपर हनुमान जी बैठे हुए हैं. ऊपर से पूरा शहर दिखता है – शांत, सुखमय और भोला सा. जैसे यहाँ के लोग. लड़ाई वड़ाई हो जाती है – पेपर में आये दिन आता है की इसने उसको माड्डाला, इसने उसको काड्डाला – यहाँ छर्रा चला, वहां तमंचा चला. परन्तु बुन्देली आदमी इतनी आसानी से नहीं गुस्साता. जैसे गुजरात की हवा में व्यापार है, वैसे यहाँ की हवा में सेंस ऑफ़ ह्यूमर यानि हास्यबोध है.

शेष क्रमशः

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*महुआ छेवले की देना यानि लम्बी लम्बी छोड़ना.

*जीप का एक तुच्छ प्रकार

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