फ़ूड कोर्ट पे बकवास

फ़ूड कोर्ट में तरह तरह के खाने की चीज़ें होती हैं पर खाने लायक कुछ नहीं. इस बात पे बकवास.

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बड़े शहरों में मॉल होते हैं. छोटे शहर वालों को लगता है कि मॉल यानि बड़े शहर होने की गारंटी. एक बड़ा सा महल जिसमें अन्दर कितने सारे सारे शीश महल और हर शीश महल में दुनिया भर से लाई हुईं हसीन सौगातें. पर असल में ऐसा है नहीं. मॉल में खरीदना तो एक शौक है. मॉल में अधिकांश लोग सबसे ऊपर वाले फ्लोर पे मूवी देखने आते हैं और अक्सर जल्दी आ जाने की वजह से इधर उधर बरामदों, स्वचालित सीढ़ियों पे वक़्त बिताते हैं. कई लोग खरीददारी करने भी आते हैं पर सिर्फ इसलिए क्यूंकि वो शहर में नए हैं और उनको पता नहीं है कि असली बाज़ार कहाँ है. और जो लोग दूर से चलके मॉल से ही ख़ास तौर पे सामान लेने आते हैं, उनकी शायद मॉली हालत काफी ज्यादा ही अच्छी होती है.

ऐसे ही महंगे मॉल में एक इलाका पाया जाता है जिसे कहते हैं फ़ूड कोर्ट. आज के कार्यक्रम में हम इसी इलाके पर विस्तृत और बेफिजूल चर्चा करेंगे. पर पहले मैं अपने दर्शकों को बता दूँ कि फ़ूड कोर्ट मॉल में होता है पर इसका ये मतलब नहीं की ये सिर्फ मॉल में ही होता है. ये मेट्रो स्टेशन के नीचे भी हो सकता है. जैसे एपिक्युरिया, नेहरु प्लेस, दिल्ली या नार्थ कोर्ट, हुडा, गुडगाँव. तो मतलब अगर फ़ूड कोर्ट स्वतंत्र रूप से दिख जाये तो “हैं???” ऐसे करके चौंकना मत. मैंने पहले से ही क्लियर कर दिया है.

फूड कोर्ट में एक जगह होती है जहाँ से कार्ड बनता है. इस कार्ड में आप रूपए डलवा सकते हैं और उन रुपयों को भिन्न भिन्न दुकानों पे भिन्न भिन्न व्यंजनों पे वेस्ट कर सकते हैं. कार्ड वाला आपका पहला दुश्मन है. अगर आप इसको पांच सौ रूपए का नोट दे कर कहेंगे कि सौ रूपए डाल दो तो वो आपको घूर के कहेगा कि पूरे पांच सौ का डाल रहा हूँ, अगर नहीं खर्च हो पाए तो रिफंड ले लेना. ये बात वो इस आत्मविश्वास में कहता है कि हमारी चम्बल घाटी में आये हो तो पांच सौ का तो कम से कम लुटोगे ही बिट्टा.

आप भी बिना बहस किये रिचार्ज करवा लेते हो. आपको पता नहीं है कि रिफंड करते टाइम ये मेंटेनेंस चार्ज काट लेगा. अब आप इस खूबसूरत मेले में छुट्टे सांड की तरह घूम सकते हैं. आपकी जेब में एक चमचमाता कार्ड है जिसमे सुन्दर सुन्दर खाने की चीज़ों के चित्र बने हैं. सामने दुकाने हैं. लोग काउंटरों पे भिखारी जैसे लाइन लगा के पर्ची कटा रहे हैं. ये ऐसी जगह है जहाँ आप महंगा भी कहेंगे, घटिया भी खाएंगे, और लाइन में लग के इंतज़ार भी करेंगे. और इंतज़ार के बाद तो सब खाना अच्छा लगता है.

अब आप सोच रहे होंगे कि मैं इतना घटिया-घटिया लगाये रखे हूँ, अगर इतना खराब खाना होता तो बिकता कैसे? तो इसका जवाब है कि बिकता तो इसलिए है क्यूंकि दिखता है. तो चलिए आपको एक के बाद एक दुकानों पे ले चलते हैं. पहले आइये के एफ़ सी पे. केंटकी फ्राइड चिकन. यहाँ अच्छी फ्राइज किसने आखिरी देखीं थीं इसपे अभी तक पुलिस की तफ्तीश जारी है. यहाँ की फ्रेंच फ्राइज नहीं फ्रेंच फ्राइज की लाशें मिलती हैं. चावल में चिकन वाली सारी डिशेस में एक बासीपन का फ्लेवर होता है. हर बार यहाँ खा के लगता है पेट खराब होगा पर होता नहीं है. यही तो यहाँ का स्पेशल है. पेट खराब होने से जस्ट पहले की फीलिंग लीजिये. यहाँ के काउंटर पे आप अपने अगले दुश्मन से मिलते हैं जो आपके आर्डर में एक्स्ट्रा चीज़ जबरदस्ती जोड़ देता है.

मैक डोनाल्ड के खाने की आदत लग जाती है, ये तो है. पर आप दो सौ रूपए दे कर घूम फिर कर आलू और कोल्ड ड्रिंक ही तो खा रहे हैं वो भी मैदे वाली ब्रेड के साथ. नॉन वेग मेनू में बस आलू की जगह चिकन कर लीजिये. और माल कोई ताज़ा तो है नहीं. आप ही के सामने प्रोसेस्ड फ्राइज के पैकेट लाये जाते हैं, और जाने कबके बासी आलू आपको तल के खिला दिए जाते हैं कोल्डड्रिंक के साथ. आपको तल के नहीं, आलू. हाँ वैसे एक तरह से देखा जाये तो आप ही तले जा रहे हैं. सिंबॉलिक.

फिर ये पिज़्ज़ा हट और डोमिनोज हैं. डोमिनोज पे आपको क्या लगता है क्यूँ इतने ऑफर चलते हैं? अब अगर मैदे पे चीज़ रखके और चार टुकड़े सब्जी या चिकन के डाल के पांच सौ रूपए में बेचोगे तो मुनाफा इतना तो ही ही जाएगा कि हर दूसरे दिन ऑफर चला सकोगे.

डोमिनोज के ओछेपन का एक नमूना पेश करने जा रहा हूँ. नोश फरमाइए. इनका जो स्टाफ काउंटर पे होता है वो आपसे हर कदम पे पूछेगा कोई ऐसा सवाल जिसका जवाब आपका बिल डबल करवा सकता है. ये आपसे आपके डिसिशन लेने की आजादी छीनने की फिराक में रहते हैं.

“सर, डबल एक्स्ट्रा चीज़ या सिंगल?”

मतलब एक्स्ट्रा तो लो ही.

“सर, इसपे ये फ्री है. दे दूँ?”

जैसे ही आप हां बोलेंगे, टैक्स और जाने क्या लग लगू के बिल तुरंत दोगुना.

“सर आपका बिल हो गया तीन सौ.”

पर मेनू में तो ये चीज़ डेढ़ सौ की है.

“सर वो हैण्ड-टोस्ड बेस पे है, मैंने आपका पैन पिज़्ज़ा कर दिया आपसे बिना पूछे.”

इसी तरफ कॉफ़ी हो तो एक्स्ट्रा आइसक्रीम, सैंडविच हो तो एक्स्ट्रा चीज, ये सारे एक्स्ट्रा खुद जोड़ने लग जाते हैं और ना लुटने की ज़िम्मेदारी पूरी तरफ से आप पर है.

अब आप सोचेंगे कि ये दुकानें तो बाहर भी होती हैं. फ़ूड कोर्ट में होने से इसमें नयी प्रताड़ना क्या है. पहली बात तो ये कि बाहर फिर भी आपको थोड़ी जगह मिल जाएगी. यहाँ पे आपको लाइन में लग के ये सडियल खाना खाना होगा. और आप यदि किसी के साथ आये हैं तो आधी नज़र आपकी आपके मित्र पर होगी और आधी काउंटर पे कि कहीं आपकी फ़ूड ट्रे ले के कोई और मनहूस आदमी न चला जाये. ऐसी अंजान दुर्घटना का भय जो है उसी का टिकट कटता है जब आप फ़ूड कोर्ट का कार्ड या कूपन लेते हैं.

इसी भय में आप जो मिला है उसको खुद की नियामत समझ कर खाते हैं.

एक और अजूबा होता है फ़ूड कोर्ट का साउथ इंडियन खाना. आप वही कॉफ़ी जो बाहर दस रूपए में पी सकते हैं, यहाँ सौ रूपए में पीते हैं. किसी भी साउथ इंडियन रेस्तरां की खासियत होती है कि यहाँ चटनी सांबर जितना चाहो उतना मिलेगा. फ़ूड कोर्ट में वो भी नहीं. एक छोटे सफ़ेद प्लास्टिक कटोरी में थोड़ा है, थोड़े की ज़रूरत है वाला हिसाब किताब रहता है.

और अगर मन कर ही जाये और सांबर लेना हो तो अपनी ट्रे उठा के ऐसे जाओ जैसे मतलब एकदम भिक्षाम देहि. आप फ़ूड कोर्ट में साउथ इंडियन खाने का मज़ा ले ही नहीं सकते क्यूंकि उसका मज़ा ही तब है जब आपको वो प्यार से बिठा कर खिलाया जाये. यही बात राजस्थानी खाने की भी है और अच्छा है कि फ़ूड कोर्ट में लाइन लगा के राजस्थानी या गुजराती थाली नहीं मिलती. उसमें अगर सीमित दाल या कढ़ी मिलेगी तो कोई मतलब ही नहीं है.

एक और प्रकार की दुकान होती है यहाँ जिसमें आइसक्रीम, जूस या जेलाटो मिलता है. यहाँ तो जैसे मालिक ने इनसे बोला होता है कि बेटा अपनी कमाई कम और किराया ज्यादा है. आइटम भी अपने ख़ास नहीं हैं तो ऐसे बेचो जैसे लूट रहे हो. ये लोग आपका कार्ड हाथ में पकड़ के पूछते हैं कि सिर्फ पचास रूपए ज्यादा देने पे एक साइज़ बड़ा मिल जाएगा. कप ले रहे हो तो कोन ले लो, कोन ले रहे हो तो टब ले लो, टब ले रहे हो तो बाल्टी लेलो. और तो और अगर आप इनसे एक आइसक्रीम या एक जूस मांगते हैं तो ये आपसे पूछेंगे “बस एक?” जैसे कह रहे हों की सब खैरियत तो है? एक से क्या होगा? एक आम आदमी तो कमसे कम दस आइसक्रीम खरीदता है. आप अजब गधे हो.” आपको इनसे बिना डरे अपनी बात पे डटे रहना होगा कि नहीं, एक मतलब एक.

बाकी महंगे का तो बता ही चुका हूँ. एक जेलाटो का कप जिसमे आधे स्कूप जितनी इतालियन आइसक्रीम आती है, लगभग सत्तर ग्राम वो आपका पड़ता है डेढ़ सौ तक का. इस से अच्छा बाहर से ढेर सारी ले लेते पर नहीं, अब कार्ड में पांच सौ हैं तो खर्च कर ही लेते हैं, क्यों?

 

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