पुस्तक समीक्षा : सारा आकाश – राजेंद्र यादव

सारा आकाश का कथानक एक जोड़े के इर्द गिर्द घूमता है. आप इसको एक प्रेमकथा के रूप में ले सकते हैं पर ये उस से कहीं ज्यादा है. समर अपनी प्रभा के साथ एक संयुक्त परिवार में रहता है. बाबूजी नाराज़ रहते हैं, माँजी चिढ़ी रहती हैं, भैया थके और हारे हैं, भाभी जली कटी सुनाती हैं. ये सारे कार्डबोर्ड से काटे हुए चरित्र हैं पर आप इन्हें थोडा हलके रूप में अपने आस पास देख चुके होंगे.

नावेल में शुरुआत काफी दुखद है. समर, जो कि दम लगा के हईशा फिल्म के नायक (आयुष्मान खुराना) की तरह आजीवन ब्रह्मचारी रहना चाहता है, आगे पढना चाहता है, कुछ करना चाहता है, पर उसका विवाह एक लड़की, जो कि शिक्षित भी है, से कर दिया जाता है. नायक तैश में नायिका से एक वर्ष तक बात ही नहीं करता. ये नावेल का प्रथम हिस्सा है, मान सकते हैं इंटरवल के पहले की कहानी है.

इंटरवल के बाद नायक और नायिका का संघर्ष एक हो जाता है और यहाँ से दुःख में बढ़ोत्तरी होती है. अकेले दम तोडती प्रभा अब अकेली नहीं है तो उसका दुःख, उसकी मैली फटी साड़ी भी अकेली नहीं है. सारा समाज खलनायकी पे उतर आता है और बातें यूँ सुनने मिलती हैं जो किसी बड़े केस में वकील आरोपी को तोड़ने के लिए कहता हो. समर प्रभा टूटते नहीं है. ये अपने निम्न मध्यवर्गीय सपने जिंदा रखते हैं. अंत सुसाइड से होगा या सुखान्त यह जानना उतना ज़रूरी नहीं है जितना इन सामाजिक दिक्कतों को समझना.

परिवार से लेकर समाज तक, हर कोई पैसे और अच्छी नौकरी से ओब्सेस्ड है. समर अकेला होकर भी अकेला नहीं है. प्रभा का साथ कभी काफी लगता है और कभी नहीं भी. यह प्रेमकहानी न होकर एक निजी लड़ाई ज्यादा है. लेखक ने बेरोज़गारी, अशिक्षा, स्त्रियों का दमन, पितृसत्तात्मक रवैय्या और दरिद्रता जैसे कई पहलुओं को छुआ है पर मुख्य थीम है हमारे देश के लोगों का अपने पुराणिक इतिहास को लेकर झूठ गौरव भाव.

यह गौरव ही समर के परिवार को संयुक्त बने रहने पर मजबूर रखता है, यह गौरव ही समर की बहन के दहेजलोभी ससुराल वालों को बार बार मौका देने को कहता है, यह गौरव ही प्रभा को चौके में और समर को नौकरी में बाँध कर रखता है. इस बंधन को तोड़ने की ललकार ही इस उपन्यास की पृष्ठभूमि है.

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