धरना – लघुकथा

धरना

धरने पर बैठे किसान अब बेसब्र होने लगे थे. नारेबाजी के जोश में कमी नहीं आई थी पर हलक सूखने लगे थे. एक दो लोग दूर से खड़े होकर न जाने किस बात पर मुस्कुरा रहे थे. लोगों की पैनी निगाह के तले प्रदर्शनकारी और भी चिड़चिडे हो चले थे. चिलचिलाती धूप में इन्साफ मिलना मुश्किल लगने लगा था. आशा सिर्फ इसलिए जिंदा थी क्योंकि चुनाव सर पर थे. ऐसे ही समय में चमत्कार होते हैं.

मसला कुछ यूँ था कि दूर गाँव से आई महिला बिलखती रही और किसी ने उसकी थाने में रिपोर्ट नहीं लिखी. वैसे तो शहर की पुलिस आजकल मुस्तैद रहती है क्योंकि माहौल गर्म है पर चूक हो गयी. और महिला किसी कारण के बिना ही मर गयी. वो मरी कोतवाली के बाहर थी तो शामत पुलिस की ही आनी थी. शामत नहीं भी आती अगर कुछ फुरसतिया पत्रकार नहीं घूम रहे होते. पत्रकारों को ब्रेकिंग न्यूज़ मिल गयी और गाँववाले इकठ्ठा होकर धरने पर बैठ गए.

आसपास की दुकानों के लोग कयास लगाने लगे कि क्या हुआ होगा. “शायद बलात्कार की रिपोर्ट नहीं लिखी गयी,” नत्थू हलवाई के यहाँ अब्दुल चाचा ने चाय सुड़कते बोला.

मुझे लगता है आपसी रंजिश का मामला है. आजकल बहुत होता है, बेटे ने माँ को मारा, भतीजे ने चाची को मारा,” गुप्ताजी बड़बड़ाए. कयासबाजी का शौक शहर को जम के था. इतने कयासों की वजह से कोई एक अफवाह ढंग से नहीं फैल पा रही थी. अनपढ़ोंगरीबों का प्रदर्शन था तो कोई बैनर नहीं था जिसपे लिखा होता कि भाई कौन मर गया और कैसे मर गया.

एक झोला टाँगे मसीहा आया और उसने घेरा बनाये गांववालों से पूरा माजरा पूछा. मसीहे को देहात की बोली आती थी. वह समझ गया और समझते ही उसने हुंकार लगाई, “हम अपना अधिकार मांगते…”

मसीहे के चेले गांववालों में घुलमिल चुके थे, सो, चेले चिल्ला दिये, “… नहीं किसी से भीख मांगते!”

भीड़ अचानक सड़क के बीचों बीच आ गयी. मसीहा आत्मदाह की धमकी देने लगा. पुलिस हड़बड़ा गयी और भीड़ को काबू करने में लग गयी. आनन फानन में कलेक्टर साहब आये और उन्होंने माहौल का जायजा लिया. मसीहा जोश में था. उसको सिर्फ और सिर्फ विधायक साहब से मिलना था. विधायक आये, कलेक्टर आये. सबने मसीहे को शांत कराने की कोशिश की. पर नारे लगते रहे. प्रेसवाले फोटो खींच रहे थे, विडियो बना रहे थे. अचानक मसीहे के कान में किसी ने फुसफुसाया कि डील हो गयी है. भीड़ छांटने लगी. मसीहे ने जोश में एक आखिरी नारा लगाया और सारी दुकान समेट ली.

एक रिपोर्टर कैमरा को देख कर कह रहा था कि, “नेताजी ने जनता को आश्वासन दिया है कि जल्द से जल्द…”

औरत की लाश अभी भी वहां थी. गुप्ताजी अभी भी पूछ रहे थे, “आखिर हुआ क्या था?”

अभ्युदय श्रीवास्तव

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